16. लोक प्रतिनिधित्व विधेयक - Page 125

110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विधि में एक उपबंध यह था कि हर छह मास में निर्वाचक नामावलियां तैयार की जानी चाहिएं। किन्तु उन्होंने स्वयं यह पाया कि यह उपबंध इतना महँगा है कि उन्होंने यह अवधि बढ़ाकर बारह मास कर दी है। भारत सरकार द्वारा यह महसूस किया गया है कि प्रौढ़ मताधिकार पद्धति, जिसे हमारे द्वारा अपनाए जाने की संभावना है, में निर्वाचकों की बहुत बड़ी संख्या के लिए एक वर्ष में दो पुनरीक्षणों की लागत बहुत अधिक हो जाएगी और परिणामस्वरूप हमने निर्वाचक नामावलियों के केवल वार्षिक पुनरीक्षण की संतुलित प्रक्रिया को ही अपनाया। जैसाकि मैंने बताया था, ये नियम जो संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों में निर्वाचक नामावली पर लागू होते हैं, राज्य विधानसभाओं ओर राज्य विधानपरिषदों पर भी लागू किए गए हैं और इसीलिए मेरे लिए यहां उनके प्रति निर्देश करना आवश्यक नहीं है।

अब मैं विधेयक के अंतिम भाग पर आता हूँ जो प्रांतों में ऊपरी चैम्बरों की संरचना के संबंध में है। माननीय सदस्यों को याद होगा कि इस राय के बारे में पर्याप्त मतभेद था कि प्रांतों में दूसरा चैम्बर होना चाहिए अथवा नहीं। संविधान सभा ने इस विषय को, संविधान सभा में विभिन्न प्रांतीय सभाओं के प्रतिनिधियों की पसंद पर छोड़ दिया था कि वे स्वयं तय करें कि क्या वे दूसरा चैम्बर चाहते हैं अथवा नहीं। कुछ सदस्यों ने विनिश्चय किया कि उनके प्रांतों में ऊपरी चैम्बर होना चाहिए और अन्य ने इसके प्रतिकूल विनिश्चय किया। परिणामस्वरूप, संविधान ने उन प्रांतों या राज्यों के लिए ऊपरी चैम्बर का उपबंध किया जिनके प्रतिनिधि ऐसा चैम्बर रखने के लिए सहमत थे। अब संविधान यह भी अधिकथित करता है कि ऊपरी चैम्बर का गठन कैसे किया जाएगाµयह अनुच्छेद 171 में मिलेगा। यहाँ पुनः, ऊपरी चैम्बरों की अधिकतर संरचना, वास्तव में संविधान द्वारा स्वयं अधिकथित है। यह कहता है कि अधिकतम कुल सदस्य संख्या, निचले सदन की कुल सदस्य संख्या के एक चौथाई से अधिक नहीं होगी और न्यूनतम सदस्य संख्या चालीस से कम नहीं होगी।

यह अनुच्छेद 171 में अधिकथित एक सिद्धांत है। यह अधिकथित दूसरा सिद्धांत विभिन्न संघटक तत्वों के मध्य स्थानों के वितरण के बारे में है जिनमें से ऊपरी सदन का गठन होगा। उदाहरण के लिए, एक तिहाई का निर्वाचन नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों तथा राज्य में अन्य ऐसे स्थानीय निकायों द्वारा किया जाएगा जो संसद विधि द्वारा विनिर्दिष्ट करे। और इनका 1/12 भाग, राज्य में निवास करने वाले ऐसे व्यक्तियों द्वारा निर्वाचित किया जाएगा जो कम से कम तीन वर्षीय स्नातक हों_ 1/12 भाग राज्य द्वारा मान्यताप्राप्त शैक्षिक संस्थाओं में अध्यापकों द्वारा निर्वाचित किया जाएगा_ एक तिहाई स्वयं विधानसभा द्वारा_ और शेष का नाम-निर्देशन राज्यपाल द्वारा व्यक्तियों के ऐसे कतिपय वर्गों में से किया जाएगा जिन्हें अनुच्छेद 171 के खंड (5) में विनिर्दिष्ट किया गया है। परिणामस्वरूप, संसद के करने के लिए बहुत थोड़ा काम ही बचता है। वास्तव में, संसद के करने के लिए जो शेष रहता है, वह यह है कि वह परिभाषित करे कि अन्य स्थानीय निकाय कौन से हैं जिनको इस प्रयोजन के लिए चुना जाना है या ऐसे निर्वाचन-क्षेत्र कौन-से हैं जो ऊपरी चैम्बर में सदस्य