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भेजेंगे। परिभाषित करने के लिए बची हुई दूसरी बात यह है कि स्नातक के समतुल्य क्या है। यदि कोई किसी विश्वविद्यालय से स्नातक है तो कोई प्रश्न उत्पन्न नहीं होता_ किन्तु ऐसे अन्य व्यक्ति हो सकते हैं जो विश्वविद्यालय न गए हों और उनके पास समतुल्य अर्हताएं हों। यह भी अवधारित किया जाना शेष है कि वह समतुल्य क्या है। तीसरे, हमें यह परिभाषित करना है कि शैक्षिक संस्था क्या है जो किसी अध्यापक को निर्वाचक होने के लिए अर्हक बनाएगी और मतदाताओं के रजिस्ट्रीकरण को भी विहित करेगी।
नगरपालिकाओं और जिला बोर्डों से भिन्न स्थानीय निकाय, जिन्हें निर्वाचनों में भाग लेना है चौथी अनुसूची में दिए गए हैं, जिसे माननीय सदस्य विधेयक के पृष्ठ 10 पर देख सकते हैं। इस अनुसूची को विभिन्न राज्य सरकारों से परामर्श करके तैयार किया गया है। माननीय सदस्य देखेंगे कि सभी मामलों मे नगरपालिकाएं और जिला बोर्ड विनिर्दिष्ट किए गए हैं। वास्तव में, हम उस उपबंध के विरुद्ध नहीं जा सकते जो संविधान में है। यह केवल प्रत्येक राज्य के अधीन इसमें उल्लिखित अन्य निकायों के संबंध में हैं जहां कोई प्रश्न या तर्क उत्पन्न हो सकता है कि क्या उस निकाय विशेष का फ्स्थानीय प्राधिकरणय् के शीर्ष के अंतर्गत सम्मिलित किया जाए अथवा नहीं।
स्नातक के समतुल्य का पता लगाने और किसी शैक्षिक संस्था को परिभाषित करने के प्रश्न के संबंध में जिससे कि कोई अध्यापक मत देने का अर्हक को सके, यह महसूस किया गया है कि सबसे अच्छा यह होगा कि इस विषय को राज्य सरकार द्वारा निर्वाचन आयोग की सहमति से अवधारित करने के लिए छोड़ दिया जाए। मैं नहीं समझता कि यह हमारे लिए या केन्द्र के लिए अभी संभव होगा कि प्रत्येक राज्य विशेष के लिए यह परिभाषित करें कि किस व्यक्ति को स्नातक समझा जाए, यद्यपि वास्तव में तकनीकी तौर पर वह स्नातक न हो।
श्री ए.पी. जैन (उत्तर प्रदेश)ः क्या मैं एक प्रश्न पूछ सकता हूँ? क्या आप इस विधि के अधीन ऐसे व्यक्ति को स्नातक के रूप में मान्यता देंगे, जिसे राज्य लोक सेवा आयोग या संघ लोक सेवा आयोग द्वारा स्नातक के रूप में मान्यता दी गई है?
डॉ. अम्बेडकरः बिन्दु यह है कि संविधान के अधीन निर्वाचन संबंधी सभी विषय वस्तुतः निर्वाचन आयोग से संबंधित हैं और यदि निर्वाचन आयोग लोक सेवा आयोग या किसी अन्य निकाय की सलाह इसलिए चाहता है कि वह सही निष्कर्ष पर पहुंच सके तो उसे ऐसा करने से निवारित नहीं किया जा सकता। किंतु अंतिम प्राधिकार निर्वाचन आयोग की सहमति से राज्य सरकार का होगा।
मेरे विचार में ऐसा कोई अन्य बिन्दु नहीं है जिसकी व्याख्या की जानी अपेक्षित हो। ये विधेयक के साधारण उपबंध हैं और मैं आशा करता हूँ कि सदन इन्हें वर्तमान परिस्थितियों में सर्वाधिक उपयुक्त पाएगा।