16. लोक प्रतिनिधित्व विधेयक - Page 130

115

डॉ. अम्बेडकरः इस तथ्य के होते हुए भी कि इस चर्चा में इतनी अधिक गरमी और तीव्रता दिखाई जा चुकी है...........।

श्री सोंधीः अभी और मिलेगी आप को।

श्री कामथः आप इसमें वृद्धि कर रहे हैं।

माननीय अध्यक्षः शांति, शांति, उन्हें बोलने दें।

डॉ. अम्बेडकरः संविधान में यह उपबंध है कि परिसीमन संसद द्वारा शुरू किया जाएगा। यह मौजूद है। इस विधेयक में हमने यह प्रस्तावित किया है कि संसद को प्राप्त यह शक्ति राष्ट्रपति को प्रत्योयोतित की जा सकती है। और राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, यह विहित कर सकेगा कि निर्वाचन-क्षेत्र क्या हैं। यह दलील दी जा सकती है और ठीक भी हैµकि यह विषय राष्ट्रपति पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए था बल्कि इस संसद को स्वयं प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र की जांच-पड़ताल करनी चाहिए। वे संसद और राज्य विधानमंडलों दोनों के निर्वाचनों के लिए बनाए जाएं। मुझे अधिकार से इनकार नहीं है, किन्तु प्रश्न यह है कि क्या ससंद, संसद और राज्य विधानमंडलों, दोनों के लिए प्रत्येक निर्वाचक-क्षेत्र की संवीक्षा करने के लिए अपेक्षित पर्याप्त समय जुटा पाएगी?

डॉ. देशमुखः यही एक मात्र रास्ता नहीं है।

डॉ. अम्बेडकरः कृपया मुझे आगे बोलने दें।

अतः इस विशिष्ट खंड 13 में यह उपबंध किया गया है कि यद्यपि, राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, निर्वाचन-क्षेत्रों को विहित और परिसीमित कर सकेगा किंतु वह परिसीमन का आदेश सदन के समक्ष रखने के लिए आबद्ध होगा। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैं भी इस उपबंध से संतुष्ट नहीं हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि संसद इनकी जांच-पड़ताल करे। किन्तु किसी ने भी ऐसा सुझाव नहीं दिया है। (रुकावट)। यह एक ऐसा बिन्दु है जिसकी प्रवर समिति जांच-पड़ताल कर सकती है, मैं इससे समहत हूँ। किन्तु इस प्रकार की बात के लिए प्रवर समिति के पास क्यों जाएँ? मेरे पास एक समाधान है। मेरे पास दो विकल्प हैं। एक यह है कि खंड 12 का संशोधन ऐसे किया जाए कि इसमें यह जोड़ा जाए कि राष्ट्रपति द्वारा किए गए परिसीमन के आदेश को संसद के सामने रखा जाए और यदि संसद इसमें कोई परिवर्तन नहीं करती है तो विहित अवधि के भीतर वह अंतिम हो जाए। यह एक विकल्प है। दूसरा विकल्प, जिसका प्रस्ताव करने के लिए मैं तैयार हूँ, यह है कि जब परिसीमन किया जाए, कोई भी परिसीमन करे, इस सदन के सदस्यों और स्थानीय विधानमंडल के सदस्यों, जो उस विशिष्ट निर्वाचन-क्षेत्र से संबंधित हैं, से मिलकर बनी एक समिति को सहयोजित किया जाए, ताकि वे इस स्थिति में हों कि परिसीमन में लगे अधिकारी को अपनी सलाह और निर्णय दे सकें। (श्री त्यागीः