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डॉ. अम्बेडकरः मुझे कोई सुझाव नहीं चाहिए।
माननीय अध्यक्षः यह बेहतर होगा कि हम विधि मंत्री की प्रतिक्रिया जानें।
श्री बुरागोहेनः श्रीमन्, असम की जनजातियों के मामले का आधार अलग है। मैं.............।
माननीय अध्यक्षः बेहतर यह होगा कि हम पहले माननीय मंत्री को सुनें। क्या माननीय सदस्य यह चाहते हैं कि मैं अभी यह संशोधन रखूँ या इसे मैं बाद में रखूँ? ठीक है, मैं इसे बादे में रखूँगा।
डॉ. अम्बेडकरः मुझे बहुत खेद है कि मैं श्री जैन या श्री जे.आर. कपूर द्वारा प्रस्तावित किसी भी संशोधन को स्वीकार नहीं कर सकता। किन्तु मैं किसी भी प्रकार के ऐसे संदेह को अवश्य दूर करना चाहता हूँ जो श्री जैन या श्री कपूर के या संसद के किसी भी अन्य सदस्य के मन में हो। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें कुछ गलतफहमी है कि खंड 6 द्वारा संसद को यह अवधारित करने के अधिकार से पूर्णतः वंचित किया जा रहा है कि निर्वाचन-क्षेत्र का स्वरूप क्या होगा, क्या यह एक-सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र होगा अथवा बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होगा, मत देने का तरीका क्या होगा, क्या यह वितरणीय मतदान होगा या एक व्यक्ति-एक मत मतदान या संचित मतदान या किसी अन्य पद्धति का मतदान होगा। मेरा तनिक भी ऐसा आशय नहीं है कि संसद को उस विषय के अवधारण के अधिकार से वंचित किया जाए। वास्तव में, जैसाकि मैंने कल अपने आरम्भिक भाषण में कहा था और प्रधानमंत्री द्वारा कल दिए गए वक्तव्य के अनुसार यह विधेयक स्वयं पूर्ण विधेयक नहीं है। इस विधेयक के बाद एक और विधेयक आएगा जिसे या तो निर्वाचनों का संचालन विधेयक या निर्वाचन विधेयक कहा जाएगा। उस विधेयक में, निर्वाचन-क्षेत्रों, अम्यर्थियों की अर्हताओं और निरर्हताओं और मतदान-पद्धति से संबंधित विषयों पर विचार किया जाएगा और निस्संदेह यह संसद की क्षमता के भीतर होगा कि उस विधेयक के सदन के समक्ष प्रस्तुत किए जाने पर वह निर्णय ले कि, निर्वाचन-क्षेत्र की पद्धति का क्या प्रकार होगा और कैसी मतदान पद्धति को वह अनुमोदित करे। अतः इस तरह का कोई आशय बिल्कुल नहीं है कि संसद की अधिकारिता पूर्णतया समाप्त की जाए। दूसरी ओर, जैसाकि मेरे माननीय मित्रों को याद होगा, मैं स्वयं भी इच्छुक हूँ कि निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन के प्रत्येक प्रक्रम पर संसद को सम्मिलित किया जाए। जैसाकि वे जानते हैं, मैं खंड 13 में यह उपबंध कर रहा हूँ कि न केवल परिसीमन आदेश सूचना हेतु संसद के समक्ष रखा जाए बल्कि मैं इस संशोधन को प्रस्तावित करने जा रहा हूँ कि संसद को ऐसे सुझाव देने और उपांतरण करने का अधिकार होना चाहिए जैसा वह उचित समझे परन्तु तब जब वह ऐसा लगभग दस दिन की कथित अवधि के भीतर करे। इसके अलावा, निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन कार्य से सहयोजित होने के लिए इस सदन की समिति नियुक्त करने के लिए अध्यक्ष