120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
को सशक्त बनाने हेतु एक संशोधन भी लाया जा रहा है, जिसके सदस्य उस विशिष्ट क्षेत्र से लिए जाएंगे। मेरे द्वारा दिए गए कथन के संबंध में, मेरे विचार में यह स्पष्ट है कि संसद की अधिकारिता समाप्त करने की मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है। मैं सदन के परिसीमन आदेश में कोई ऐसे परिवर्तन करने के अधिकार सहित जो वह करना चाहे, इस आदेश को सदन के पटल पर रखने के लिए उपबंध कर रहा हूँ और साथ ही यह उपबंध भी किया जा रहा है कि अध्यक्ष को परिसीमन कार्य से सहयोजित होने वाली समितियाँ नियुक्त करने का अधिकार होगा। मैं नहीं समझता कि किसी भी सदस्य को इसमें कोई संदेह है कि हम इस विषय पर संसद का विनिश्चय लेने के लिए पूरी तरह से इच्छुक हैं। बात केवल यह है कि यह विधेयक पहले आ गया है जबकि वास्तव में वह विधेयक पहले आना चाहिए था। मुद्दा यह है कि इस विधेयक का खंड 6, जो परिसीमन के लिए उपबंध करता है, निश्चित रूप से तब तक प्रवृत्त नहीं होगा जब तक कि वह दूसरा विधेयक पारित न हो जाए। स्पष्ट रूप से यह इसलिए है क्योंंक, जैसाकि आप जानते हैं, अब हम अनुपूरक निर्वाचक नामावलियों का उपबंध करने वाली धारा 21 का संशोधन कर रहे हैं जिसके लिए स्वयं बहुत लम्बी अवधि अपेक्षित होगी और इससे हमें यह विधेयक संसद के समक्ष प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर मिल जाएगा।
श्री सोंधीः इस खंड को विलुप्त ही क्यों न किया जाए जब इसे प्रवर्तन में नहीं आना है।
डॉ अम्बेडकरः इसे विलुप्त नहीं किया जाना चाहिए।
ऽश्री केशव राव (मद्रास)ः खंड 6 उपखंड (ख) के संबंध में मुझे कुछ संदेह है। मुझे डर है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थान राष्ट्रपति द्वारा, निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के पश्चात् अवधारित किए जाएंगे। मुझे संदेह है कि कुल आरक्षित स्थानों की संख्या कहीं भी नहीं बताई गई है। संसद में और संविधान सभा में भी कई बार यह कहा गया था कि यह संख्या नियत की जाए।
डॉ. अम्बेडकरः संविधान में इसका उपबंध जनसंख्या के आधार पर किया गया है। मात्र यह आवश्यक है कि जनसंख्या का पता लगाया जाए। जहाँ तक परिसीमन का संबंध है, मुझे भी कुछ संदेह हैं.......
माननीय अध्यक्षः माननीय सदस्य प्रशासनिक ब्यौरों में न जाएँ। सदन केवल इतना कर सकता है कि वह सिद्धांत विनिश्चित करके संबंधित अधिकारियों पर इसे क्रियान्वित करने के लिए छोड़ दे। किंतु मुझे स्वयं श्री ए.पी. जैन के संशोधन के बारे में और जो कुछ पंडित ठाकुर दास भार्गव ने कहा, उस पर संदेह है। मैं संविधान सभा में हुई चर्चा से परिचित नहीं हूँ और न ही आज प्रातः अनौपचारिक बैठक में हुई चर्चा
ऽसं. वा., खंड 4, भाग II, 20 अप्रैल, 1950, पृष्ठ 3064-65