16. लोक प्रतिनिधित्व विधेयक - Page 137

122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

डॉ. अम्बेडकरः यह उसके अतिरिक्त है, जो सदन करेगा। मैं इसके आगे भी कुछ कर रहा हूँ। अब मैं, निर्वाचन-क्षेत्र के अवधारण के विषय में निर्वाचन आयुक्त के साथ कार्य करने के लिए समितियों की नियुक्ति करने में आपको समर्थ बनाने के लिए खंड 13 में एक संशोधन प्रस्तावित कर रहा हूँ। मेरे द्वारा किया जाने वाला दूसरा उपबंध यह हैः आदेश में यथा वर्णित निर्वाचन-क्षेत्र उस समिति की सिफारिश के अनुसार होंगे न कि निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के अनुसार। मैं एक संशोधन द्वारा निर्वाचन आयोग को काट रहा हूँ। मैं ऐसा करने का प्रत्यक्ष प्राधिकार समिति को दे रहा हूँ।

श्री कामथ (मध्य प्रदेश)ः क्या समिति नियुक्त होगी या निर्वाचित?

डॉ. अम्बेडकरः ऐसी रीति से जो अध्यक्ष तय करें।

पंडित ठाकुर दास भार्गवः हो सकता है समिति और निर्वाचन आयोग प्रत्येक राज्य के संबंध में भिन्न विनिश्चय करें और समान आधार पर न पहुंचे।

डॉ. अम्बेडकरः जैसाकि मैंने अभी बताया था, मैं ये विषय अवधारित करने के लिए एक विधेयक लाऊँगा और जब विधेयक पारित हो जायेगा तब जो भी विधि या उपबंध बनाया जाएगा, संसद की इच्छा के अनुसार संपूर्ण भारत में एक-समान रूप से या अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न रूप से लागू किया जाएगा।

ऽडॉ. अम्बेडकरः मैं अपने आश्वासन पर स्थिर हूँ कि एक विधयेक लाया जाएगा। मैं दोनों पहलुओं पर विचार करूँगाः (1) निर्वाचन-क्षेत्रों की प्रकृतिµक्या वे एक सदस्यी होंगे या बहु-सदस्यीः और (2) मतदान की पद्धति क्या होगी। जैसा कि मैंने कहा था, हम अभ्यर्थी, उसकी अर्हताओं और निरर्हताओं पर भी विचार करेंगे। संसद से शक्ति ले लेने की मेरी कोई इच्छा नहीं है और पूरे आदर के साथ मैं यह कहना चाहूँगा कि मैं अपने माननीय मित्र श्री सन्थानम् से सहमत नहीं हूँ जिन्होंने कहा था कि यह ऐसा विषय है जिसे पूर्ण रूप से निर्वाचन आयोग पर छोड़ देना चाहिए। निर्वाचन आयोग का कार्य मात्र निर्वाचनों का नियंत्रण और पर्यवेक्षण है किन्तु निर्वाचन-क्षेत्रों का परीसीमन ऐसा विषय है जो संसद का है।

माननीय अध्यक्षः क्या श्री जैन चाहते हैं कि मैं उनका संशोधन सदन में प्रस्तुत करूं?

श्री ए.पी. जैनः मैं केवल कुछ शब्द कहना चाहता हूँ।

माननीय अध्यक्षः मेरे विचार में, हम पर्याप्त चर्चा कर चुके हैं। यह गलत प्रक्रिया होगी यदि मैं किसी व्यक्ति को उसी संशोधन पर बार-बार बोलने की अनुमति दूँ। यदि वे चाहते हैं कि मैं उनका संशोधन सदन के सामने लाऊँ तो मैं ऐसा करूँगा।

ऽसं. वा., खंड 4, भाग II, 20 अप्रैल, 1950, पृष्ठ 3068-71