124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पंडित बालकृष्ण शर्मा (उत्तर प्रदेश)ः श्रीमन्, स्पष्टीकरण के बिन्दु पर मेरे माननीय मित्र पंडित ठाकुरदास भार्गव द्वारा व्यक्त इस संदेह का, कि तीन से सात सदस्यों से मिलकर बनी विभिन्न समितियाँ, जिनकी नियुक्ति माननीय अध्यक्ष द्वारा की जा सकेगी, विभिन्न राज्यों के लिए विभिन्न सिफारिशें कर सकती हैं और इसीलिए उनमें एकरूपता नहीं होगी, उत्तर नहीं दिया गया है। उस स्थिति के लिए क्या व्यवस्था की गई है?
डॉ. अम्बेडकरः उत्तर बहुत आसान है। संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों और राज्य विधानमंडलीय निर्वाचन-क्षेत्रों, दोनों के संबंध में, समितियों का कार्य विधि द्वारा शासित होगा, जिसे, जैसा मैंने बताया था, इसके पश्चात् संसद बनाएगी। अतः वे स्वतंत्र रूप से काम नहीं करेंगी।
डॉ. देशमुख (मध्य प्रदेश)ः श्रीमन्, जब विधि मंत्री ने फ्निर्वाचन आयोगय् शब्दों को लोप करने का प्रस्ताव किया तो मुझे बहुत प्रसन्नता हुई थी। किन्तु दुर्भाग्यवश, वे पुनः खंड 13 में संशोधन द्वारा आ रहे हैं। आज मेरी मनःस्थिति बहुत ही सहयोगपरक है और संपूर्ण स्थिति पर अत्याधिक सहानुभूतिपूर्वक विचार करने के लिए तैयार हूँ किंतु मैं इस पर जोर देना चाहूँगा कि निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन कार्य से निर्वाचन आयोग के पूर्ण रूप से अलग रखा जाए। यह ऐसा निकाय है जो संविधान के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया है और इसके कार्य संविधान के अनुच्छेद 324 द्वारा अवधारित किए गए हैं। अतः कुछ ऐसा संशोधन किया जाए, कि राष्ट्रपति ऐसे निकायों का सृजन करेगा जो निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन के लिए आवश्यक हों। प्रमुख विचार यह है कि निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन में प्रत्यक्ष रूप से कोई भी कार्यवाही करने वाला निर्वाचन आयोग अंतिम निकाय होना चाहिए।
श्री कामथः इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए इस विधेयक में परिकल्पित कार्य तुरन्त प्रारम्भ किया जाएगा, क्या मैं यह समझूँ कि इस संशोधन का आशय यह सुनिश्चित करना है कि इन समितियों-सलाहकार या अन्यथा-का गठन तुरन्त किया जाएगा।
डॉ. अम्बेडकरः नहीं, जैसे ही दूसरा कार्य तैयार होगा, इनका गठन कर दिया जाएगा।
माननीय अध्यक्षः माननीय सदस्य देखेंगे कि प्रस्ताव करने के लिए कोई प्रशासनिक मशीनरी स्थापित करनी होगी, और जहाँ तक मैं देखता हूँ, वह प्रशासनिक मशीनरी निर्वाचन आयोग है।
डॉ. अम्बेडकरः अन्यथा, सदन के सदस्य किसी निर्वाचन-क्षेत्र का परिसीमन कैसे करेंगे?
माननीय अध्यक्षः मैं एक और बात की तरफ सदन का ध्यान आकर्षित करना