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हैं, अतः वे व्यक्ति, जिनके नाम इस रजिस्टर में दर्ज नहीं हैंµइस कारण से नहीं कि वे अर्हक नहीं हैं अपितु इस कारण कि रजिस्टर तैयार नहीं हुए हैं, सरकारी अस्पतालों में कोई पद धारित नहीं कर पाएंगे। अतः इस कालावधि को बढ़ाना तथा ऐसे व्यक्तियों को इस बात की अनुमति देना आवश्यक हो गया है कि इस रजिस्टर में उनके नाम दर्ज न होने पर भी वे अस्पतालों में नौकरी पा सकते हैं।
दूसरे, बंगाल में एक दंत चिकित्सा स्कूल है जो दंत चिकितसा में डिप्लोमा प्रदान करता है। जब इस अधिनियम को पारित किया गया था उस समय यह संविवाद था कि क्या इस बंगाल दंत चिकित्सा स्कूल द्वारा दिए जाने वाले डिप्लोमा को मान्यता दी जानी चाहिए ताकि डिप्लोमाधारी व्यक्तियों के नाम इस रजिस्टर में दर्ज किए जा सकें। यह महसूस किया गया कि बंगाल दंत चिकित्सा स्कूल द्वारा दिया जाने वाला डिप्लोमा, रजिस्टर में नाम दर्ज कराए जाने के उद्देश्य से पर्याप्त अर्हता नहीं है। इस दंत चिकित्सा स्कूल द्वारा प्रदान किए गए डिप्लोमा को धारण करने वाले व्यक्तियों द्वारा इस अयोग्यता को समाप्त करने के लिए काफी आंदोलन किया गया। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा इस संबंध में एक समझौता सुझाया गया है जिसके अनुसार ऐसे व्यक्तियों के नाम जिन्होंने अपना डिप्लोमा वर्ष 1940 से पहले प्राप्त किया है, कुछेक शर्तों के साथ इस रजिस्टर में दर्ज करने के लिए अर्हित माने जाएंगे। इस समझौते को भी इस विधेयक में स्थान दिया गया है।
अतः इस विधेयक में तीन उपबंबध हैंः (1) इस अवधि को बढ़ाना, (2) कुछेक परिस्थितियों में ऐसे व्यक्तियों के नाम जिनके पास बंगाल दंत चिकित्सा स्कूल का डिप्लोमा है, रजिस्टर में दर्ज किए जाने की अनुमति देना तथा (3) जब तक यह रजिस्टर तैयार न हो, वर्ष 1951 तक सरकारी अस्पतालों में अपंजीकृत दंत चिकित्सकों का रोजगार जारी रखना।
इस विधेयक में यही सब कुछ शामिल है तथा मुझे आशा है कि इस विधेयक को अपनी अनुमति देने में सदन को कोई कठिनाई नहीं होगी।
माननीय अध्यक्षः प्रस्ताव पेश किया गयाः
फ्कि दंत चिकित्सक अधिनियम, 1948 का संशोधन करने के इस विधेयक पर विचार किया जाए।य्
श्री सिधवा (मध्य प्रदेश)ः सबसे पहले मैं इस अध्यादेश को ऐसे समय जारी करने पर कड़ी आपत्ति व्यक्त करता हूँ जब मार्च माह में सदन की बैठक चल रही थी।
डॉ. अम्बेडकरः यह अध्यादेश मई में किसी समय जारी किया गया था।