17. दंत चिकित्सक (संशोधन) विधेयक - Page 159

144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

खंड 2

ऽडॉ अम्बेडकरः काश! मेरे माननीय मित्र श्री सिधवा तथा पंडित ठाकुर दास भार्गव ने अपने द्वारा उठाए गए मुद्दों को उस समय तक रोके रखा होता जब उनके संशोधनों पर विचार किया जाता। ऐसे विषयों पर उत्तर देना निस्सन्देह कुछ द्विविधाजनक होगा, जो निस्संदेह उस समय पुनः उठाए जाएंगे। जब उनके संशोधन पेश किए जाएंगे। लेकिन अब मेरे पास उनके द्वारा उठाए गए बिन्दुओं का उत्तर देने के अलावा कोई चारा नहीं है_ किन्तु मैं इनका उत्तर संक्षेप में दूंगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि मुझे कहना पड़ेगा कि.............

माननीय अध्यक्षः मैं इन संशोधनों पर किसी प्रकार की बहस की अनुमति देना नहीं चाहता।

पंडित ठाकुर दास भार्गवः यदि मेरे माननीय मित्र मेरे द्वारा प्रस्तुत किए संशोधन को स्वीकार नहीं करते हैं, तो मैं इसे प्रस्तुत नहीं करूंगा।

डॉ. अम्बेडकरः श्री सिधवा ने एक-दो मुद्दे उठाए हैं। उनके द्वारा उठाया गया अंतिम मुद्दा था कि जब सदन की बैठक चल रही थी तब अध्यादेश क्यों जारी किया गया। इसके दो उत्तर हैं। पहला यह कि इस रजिस्टर को तैयार करने के लिए समय बढ़ाने के मामले में भारत सरकार से जो प्रथम अनुरोध किया गया था वह मद्रास सरकार द्वारा किया गया था और वह भी 15 मार्च, 1950 को या उसे बाद में? इसका अर्थ यह है कि इस रजिस्टर को तैयार करने में लगने वाली अवधि को समाप्त होने में केवल 13 दिन शेष बचे थे। यह पहला कारण है। दूसरा कारण यह है कि मद्रास सरकार से उस पत्र की जिसमें भारत सरकार को सूचित किया गया था कि इस रजिस्टर को पूरा करना उनके लिए संभव नहीं है, प्राप्ति के बाद, स्वाभाविक तौर पर, भारत सरकार के लिए यह आवश्यक था कि वह अन्य राज्यों से यह पता लगाए कि क्या वे निर्धारित तारीख तक अपनी सूची तैयार करने की स्थिति में हैं, अथवा वे भी समय बढ़वाना चाहते हैं। स्वाभाविक तौर पर इसके बाद भारत सरकार और अन्य विभिन्न राज्यों में पत्राचार हुआ।

निस्संदेह उन्होंने समय लिया और समय लेना भी था, जिसका परिणाम यह हुआ कि जब तक भारत सरकार को ये उत्तर प्राप्त हुए और वह यह मूल्यांकन कर सकी कि क्या मद्रास सरकार द्वारा प्रस्तावित शब्दों में संशोधन आवश्यक है, संसद का सत्र समाप्त हो गया। यही कारण है कि मध्यावकाश से पहले उस उपाय को नहीं लाया जा सका।

मेरे मित्र श्री सिधवा द्वारा उठाया गया दूसरा मुद्दा यह था कि उन्हें इसमें कोई कारण नजर नहीं आता कि बंगाल दंत चिकित्सा स्कूल द्वारा प्रदान की जाने वाली कुछेक

ऽसं. वा., खंड 4, भाग II, 11 अगस्त, 1950, पृष्ठ 856-62