17. दंत चिकित्सक (संशोधन) विधेयक - Page 160

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अर्हताओं को मान्यता देने के लिए कानूनी उपबंध क्यों किया जाए। उनके अनुसार, यह ऐसा मामला है जिसे इस अधिनियम के अनुसार दंत चिकित्सा परिषद के विवेक पर छोड़ दिया गया है। मैं सोचता हूँ कि मेरे मित्र श्री सिधवा ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा छोड़ दिया है और वह यह है कि परिषद को मान्यता प्रदान करने का अधिकार उन अर्हताओं या डिग्रियों से सम्बद्ध है जो वर्तमान स्कूलों द्वारा प्रदान की जाती हैं किंतु जिस मामले से हम जुड़े हुए हैं वह एक ऐसा मामला है जिसमें डिग्रियां अथवा डिप्लोमा एक ऐसे निकाय द्वारा प्रदान किए गए हैं जिसने कार्य करना बंद कर दिया है। परिणामस्वरूप, यह मौजूदा सरकार की जिम्मेदारी है कि वह यह निर्णय ले कि दंत चिकित्सा में शिक्षा देने वाले एक स्कूल द्वारा प्रदान की गई डिग्रियां मान्यता योग्य हैं भी या नहीं। यह ऐसा मामला नहीं है जिसे धारा 10 के उपखंड (2) के अधीन बंगाल की परिषद पर छोड़ दिया जाए। शब्द है फ्प्रदान करता हैय् जिसका अभिप्राय है फ्जो इस समय भी प्रदान कर रहा हैय्, और वे डिप्लोमा नहीं जो पहले प्रदान किए जा चुके हैं। ऐसा होने के कारण यह मामला ऐसा नहीं हो सकता जो दंत चिकित्सा परिषद की शक्तियों के अधीन उस पर छोड़ दिया जाए और यदि हमें इस अनुसूची में संशोधन करना पड़े तो भी इसे कानून द्वारा ही किया जाना चाहिए। यही कारण है कि इस विधेयक में कानूनी उपबंध किया गया है ताकि इस विशेष मामले को इसमें शामिल किया जा सके।

अब, बंगाल दंत चिकित्सा स्कूल के बारे में मैंने जो कहा है वह उस प्रश्न पर भी लागू होता है जिसे मेरे मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव ने उठाया था।

अब मैं श्री कामथ द्वारा उठाए गए मुद्दे पर आता हूँ। उनके द्वारा उठाया गया पहला मुद्दा कमोवेश तकनीकी था। यदि मैंने उनकी बात सही समझी है तो उन्होंने कहा था कि कानूनी दृष्टि से रजिस्टर 28 मार्च, 1950 तक तैयार होना चाहिए था और यदि किसी व्यक्ति का नाम इस रजिस्टर में नहीं है तो धारा 46 और 49 के उपबंधों के अधीन उस पर कुछ शास्तियां लगाई जाएंगी, जबकि वह अध्यादेश, जिस द्वारा संबंधित व्यक्ति को इन शास्तियों से छूट मिलती है, 29 मई, 1950 को लागू हुआ। इस प्रकार, अब दो माह की अवधि बचती है जिसमें यदि किसी व्यक्ति पर जिसका नाम इस रजिस्टर में दर्ज नहीं है और जो फिर भी चिकित्सा व्यवसाय जारी रखता है अथवा पदधारी है, कुछ शास्तियाँ लगाई जा सकती हैं। इन व्यक्तियों की स्थिति क्या है? मैं सोचता हूँ मेरे मित्र श्री कामथ ने यदि इस विधेयक में प्रस्तावित संशोधन के शब्दों को स्पष्ट रूप से पढ़ा होता तो उन्होंने देखा होता कि इन उपबंधों का कहना है किः

फ्उपर्युक्त अधिनियम की धारा 46 की उप-धारा (3) और धारा 49 की उप-धारा (1) में ‘दो वर्ष की अवधि’ शब्दों के स्थान पर ‘तीन वर्ष की अवधि’ शब्द रखे जाएंगे और इसे हमेशा प्रतिस्थापित हुआ समझा जाएगा।य्