17. दंत चिकित्सक (संशोधन) विधेयक - Page 165

150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

डॉ. अम्बेडकरः हम इस संस्थान को किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं कर रहे हैं। हम इस संस्थान द्वारा 1940 में अर्थात् 8 वर्ष पहले प्रदान की गई डिग्रियों पर चर्चा कर रहे हैं।

श्री त्यागीः डॉ. अम्बेडकर मुझसे यह आशा करते हैं कि मैं इस बात पर विश्वास करूँ कि संस्थान द्वारा प्रदान की जाने वाली डिग्रियों को मान्यता प्रदान की जाए, भले ही स्वयं संस्थान को मान्यता प्राप्त न हो। अमुक-अमुक वर्ष में प्रदान की गई कलकत्ता विश्वविद्यालय की डिग्रियों को भारतीय सिविल सेवा अथवा भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए मान्यता दी जा सकती है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि कलकत्ता विश्वविद्यालय मान्यता प्राप्त है। क्या तर्क है। यहाँ मैं उन्हें अधिक शक्तियां दे रहा हूँ। मैं यह सुझाव दे रहा हूँ कि वे उस संस्थान को मान्यता भी प्रदान कर सकते हैं। मैं चाहता हूँ सरकार के पास ऐसी शक्तियां हों कि वह किसी भी संस्थान को मान्यता प्रदान कर सके.........।

डॉ. अम्बेडकरः ये शक्तियां धारा 10(2) में विद्यमान हैं।

ऽमाननीय उपाध्यक्षः क्या मैं इस संशोधन पर माननीय मंत्री की प्रतिक्रिया जान सकता हूँ?

डॉ. अम्बेडकरः यही खंड ऐसा खंड है जो वास्तविक रूप से पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दिए गए सुझाव को कार्यान्वित करता है। व्यक्तिगत तौर पर मैं स्वयं यह महसूस करता हूँ, तथापि मेरी अधिक सहानुभूति मेरे मित्र श्री भार्गव के साथ होगी, इसमें एक दंत चिकित्सक की अर्हता के मूल्यांकन का प्रश्न शामिल है जो एक ऐसे व्यक्ति से जो नकली दांत बनाता है, भिन्न है। मैंने यह सोचा कि वे नकली दांत बनाने वाले व्यक्ति के प्रति काफी वाक्पटु हैं। ऐसा व्यक्ति जो नकली दांत बनाता है, जरूरी नहीं कि वह दंत चिकित्सक भी हो। हम दंत चिकित्सक की बात कर रहे हैं जो बहतु भिन्न पेशा है।

पंडित ठाकुर दास भार्गवः किन्तु उनके पास एल.डी.एस.सी. की डिग्री है।

डॉ. अम्बेडकरः मुद्दा यह है कि जब यह अधिनियम पारित किया गया था, तब इस संस्थान को मान्यता प्रदान करने योग्य नहीं समझा गया था। तदुपरांत इस संबंध में काफी आन्दोलन हुआ और पश्चिम बंगाल सरकार ने यह जाँच-पड़ताल करने का विनिश्चय किया कि क्या इस कालेज में शिक्षा द्वारा अर्हता प्राप्त कोई भी व्यक्ति मान्यता प्राप्त करने के योग्य है। वे इस नतीजे पर पहुँचे कि वर्ष 1940 से पहले इस संस्थान का स्तर

ऽसं. वा., खंड 5, भाग II, 11 अगस्त, 1950, पृष्ठ 867-68