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ऽनिष्क्रांत संपत्ति (संशोधन) प्रशासन विधेयक
विधि मंत्री (डॉ. अम्बेडकर)ः मैं प्रारंभ में यह कहना चाहूँगा कि संसद समवर्ती क्षेत्र में विधि द्वारा राज्य की विधि को निरसित कर सकती है नामक मुद्दा बहुत बाद में उठाया गया है। मुझे पक्का भरोसा है कि इस संसद ने अनेक ऐसी विधियाँ पारित की हैं जिनमें यह उपबंध है कि संसद समवर्ती क्षेत्र में विधि द्वारा राज्य विधि को निरसित कर सकती है। मेरे मित्र श्री जैन ने उनमें से एक का उल्लेख किया_ जिसे संसद ने पारित किया है। इस विधि का नाम है आमेलित राज्य अधिनियम, (1949 का अधिनयम LIX )। यदि इस विषय में रुचि रखने वाले मेरे मित्र इस विशेष विधि के उपबंधों का अवलोकन करें तो वे पाएंगे कि ऐसी बहुत-सी विधियां हैं जो समवर्ती क्षेत्र में आती हैं तथा जो राज्यों द्वारा अधिनियम की गईं तथा इस अधिनियम विशेष द्वारा उन्हें निरसित किया गया। अतः जहाँ तक कार्यान्वयन का संबंध है, मैं नहीं मानता कि इस विधेयक में शुरू किए गए प्रस्ताव में कोई नयापन है। हाँ, यह अवश्य तर्क का विषय है कि इसका कार्यान्वयन संविधान के उपबंधों के अनुरूप नहीं है तथा इसीलिए संविधान में इसकी आवश्यक नहीं है। मैं समझता हूँ यह कार्यान्वयन पूर्णरूप से संविधान के अनुरूप है।
मेरे माननीय मित्र श्री अनंतशयनम् अय्यंगर ने उप-धारा (2) परंतुक का ठीक ही उल्लेख किया है। मेरी राय में, इस परंतुक का महत्व इसी में निहित है कि संसद के लिए न केवल विधि बनाना और समवर्ती क्षेत्र में राज्य द्वारा बनाई गई किसी विधि का संशोधन करना, उसमें परिवर्तन करना, अथवा उसमें कुछ जोड़ना संभव है, अपितु इसे उस विधि को रद्द करने का भी अधिकार है। मेरे विचार में इस परंतुक से यह काफी स्पष्ट हो जाता है। जहाँ तक इस परंतुक का संबंध है, समवर्ती क्षेत्र में राज्य द्वारा बनाई गई विधि को रद्द करने का संसद की शक्ति विनिर्दिष्ट है। किन्तु मेरे माननीय मित्र श्री अनंतशयनम् का मुद्दा यह है कि यह परंतुक केवल उप-धारा (2) से सम्बद्ध है। अब मेरा मानना यह है कि यदि वे उप-धारा (2) मैं उल्लिखित आवश्यकताओं पर विचार करें तो उन्हें ज्ञात होगा कि संविधान में उप-धारा (2) को जोड़ना क्यों काफी समझा गया और इसे उप-धारा (1) तक बढ़ाने के लिए आवश्यक क्यों नहीं समझा गया। मेरे मित्र पाएंगे कि अनुच्छेद 254 का उप-खंड (2) एक ऐसी विधि के प्रति निर्देश करता है जिसे यदि मेरे मित्र अनुमति दें तो मैं ‘संरक्षित विधि’ कहूँगा अर्थात् ऐसी विधि जिसे न केवल राज्य विधानमंडल ने पारित किया हो, बल्कि जिसे राष्ट्रपति की अनुमति के लिए आरक्षित रखा गया और जिसे राष्ट्रपति ने अपनी अनुमति प्रदान कर दी है। यही वह विधि है जिसका उप-खंड (2) में उल्लेख किया गया है। अब यह महसूस किया
ऽसं. वा., खंड 5, भाग II, 21 नवंबर, 1950, पृष्ठ 339-341