158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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ऽसंसद तथा राज्य विधानमंडलों के निर्वाचनों के लिए अर्हताएँ
श्री सर्वटे (मध्य प्रदेश)ः महोदय, संशोधन पर आगे की कार्रवाई करने से पूर्व क्या आप डॉ. अम्बेडकर को बुलाकर यह नहीं पूछना चाहेंगे कि क्या प्रो. के.टी. शाह द्वारा दिए गए सुझाव के विषय में वे कुछ कहना चाहेंगे।
माननीय अध्यक्षः मैं नहीं समझता कि उन्हें कुछ कहने के लिए बुलाना आवश्यक है। यदि आवश्यक होता, तो मैं उन्हें अवश्य बुलाता।
विधि मंत्री (डॉ. अम्बेडकर)ः मैं अपने मित्र प्रो. के.टी. शाह के प्रस्ताव पर कुछ न बोलकर उन्हें यह महसूस नहीं कराना चाहता कि मैं उनका आदर नहीं करता। महोदय, यदि आप मुझे इस स्तर पर अनुमति दें तो मैं कुछ कहना चाहूंगा।
माननीय अध्यक्ष मुझे यह मानना पड़ेगा कि जब प्रो. शाह द्वारा प्रस्तुत किए गए संकल्प का पाठ मुझे प्राप्त हुआ मैं असमंजस में पड़ गया, क्योंकि मैंने महसूस किया कि इस प्रकार के संकल्प में सरकार को यह इंगित करने वाले, कि संविधान में एक ऐसा अनुच्छेद भी है जो उन्हें उस पर नियम बनाने की अनुमति देता है, केवल ये शब्द ही नहीं होने चाहिएं बल्कि इस प्रकार की विधि के संबंध में सरकार को क्या करना चाहिए इस विषयक सुझाव भी शामिल किए जाने चाहिए। जैसा कि मैंने कहा कि मैं बहुत असमंजस में था, इसलिए इस संकल्प के संबंध में मैं क्या रूख अपनाऊँ इसका विनिश्चय करना मेरे लिए बहुत कठिन था। मुझे अब पता चला कि प्रो. शाह द्वारा तैयार किए गए संकल्प का लक्ष्य वास्तव में विमर्शित था। संविधान में सुसंगत अनुच्छेद के उप-खंड (ग) के अधीन विधान में क्या सम्मिलित किया हो इस संबंध में वह सदन से चाहते थे कि उन्हें कुछ विचार बताया जाए। मुझे इस प्रकार की कार्यप्रणाली पर कोई आपत्ति नहीं है, किन्तु मुझे सोचना चाहिए था कि यदि प्रो. शाह इस प्रकार के विधायन के इतने इच्छुक थे जितने वे दिखते थे, तो बिना किसी अपने सुझाव के वे खाली दिमाग यहां नहीं आते। हालांकि मैं समझता हूँ कि जिन्होंने उनके संकल्प का समर्थन किया है उन्होंने उनके विचार अच्छी तरह से समझे हैं तथा प्रो. शाह के समर्थन में दिए गए विभिन्न भाषणों को ध्यान में रखते हुए ऐसा लगता है कि कुछ सदस्य संविधान में उल्लिखित अर्हताओं के अतिरिक्त जो अर्हताएं जोड़ने के इच्छुक हैं वे शायद शैक्षणिक अर्हताओं के विषय में बात कर रहे हैं। किन्तु उनमें से कोई भी स्पष्ट नहीं हैः उनमें से किसी ने भी कोई सुझाव नहीं दिया कि वे शिक्षा का क्या मानदंड निर्धारित करना चाहते हैं ताकि कोई उम्मीदवार विधिपूर्णतया चुनाव लड़ने का हकदार हो सके।
ऽसं. वा., खंड 6, भाग II, 21 नवंबर, 1950, पृष्ठ 537-41