20. संसद तथा राज्यों के विधानमंडलों में निर्वाचन के लिए अर्हताएँ - Page 174

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अब मुझे ऐसा लगता है कि इस सदन की सदस्यता के लिए शिक्षा ही एक मात्र अर्हता नहीं हो सकती। यदि मैं भगवान बुद्ध के शब्दों का प्रयोग करूं, उन्होंने कहा था कि मनुष्य को दो चीजों की आवश्यकता होती है। एक तो ज्ञान और दूसरा शील। शील के बिना ज्ञान अत्यंत खतरनाक होता हैः ज्ञान के साथ शील का होना अनिवार्य है। शील का अर्थ है चरित्र, नैतिक साहस, किसी भी प्रकार के लोभ में तटस्थ रहने की क्षमता और अपने आदर्शों पर टिके रहना। मैंने प्रो. शाह के प्रस्ताव के समर्थन में कई सदस्यों के विचार सुने पर उनमें से किसी ने भी अपने भाषण में द्वितीय अर्हता के संबंध में कुछ नहीं कहा, किन्तु फिर भी मैं स्वयं यह सुनिश्चित करने के लिए उत्सुक हूं कि कोई भी सदस्य जिसमें शील न हो, इस महान सदन में नहीं आता है, इस बहुमूल्य अर्हता को सुनिश्चित करने के लिए कोई साधन या पद्धति खोज पाना। मुझे अत्यंत कठिन लगता है।

शिक्षा के प्रश्न पर मैं आपको स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि आप यह न समझें कि मैं अज्ञानता को कोई विशेष गुण मानता हूँ। मैं शिक्षा को उस सामर्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक अर्हता मानता हूँ जो अपना कार्य करने के लिए किसी व्यक्ति के पास होनी अनिवार्य है। इस सदन में कई ऐसे व्यक्ति हैं,जो हालांकि शिक्षित नहीं हैं, फिर भी वे जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनकी शिकायतों को व्यक्त करने में सक्षम हैं। और मैं इस विषय में आश्वस्त हूँ। अधिक शिक्षित व्यक्ति इस प्रकार का कार्य करने में समर्थ नहीं होगा क्योंकि वह नहीं जानता और उसे इसका अनुभव भी नहीं होता। किन्तु मेरे वे मित्र जो इस वर्ग से आते हैं तथा स्वाभाविक रूप से मेरी सहानुभूति उनके साथ है, यह नहीं महसूस करते कि जिस वर्ग का वे प्रतिनिधित्व करते हैं उनकी सहायता करने के लिए सदन में भाषण देना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उन्हें शिकायतों को दूर करने के उपाय भी सुझाने चाहिए। सदन में भाषण देना तथा शिकायतों को सामने लाना बहुत आसान कार्य है किन्तु समस्याओं का समाधान तैयार करना अत्यंत दुष्कर कार्य है। इसके लिए शिक्षा की आवश्यकता है और पिछड़ी जाति, अनुसूचित जाति या जनजाति क्षेत्रों के दृष्टिकोण से शिक्षा का होना भी एक महत्वपूर्ण तत्व है। हम इसे कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं? जब मैंने इस सुझाव पर कि सदन की सदस्यता के लिए कोई शैक्षणि् ाक अर्हता होनी चाहिए, विचार किया तो मैंने पाया कि जो प्रस्ताव सिद्धांत रूप से या शैक्षणिक दृष्टि से बहुत बढि़या है। उसकी अन्य कमियों को सामने लाए बिना उस पर ध्यान नहीं दिया जा सकता। यह मेरे लिए एक समस्या है। आप इसके मानदण्ड कहाँ निर्धारित करेंगे? क्या आप कहेंगे कि केवल स्नातक ही इस सदन के सदस्य होंगे? यदि आप ऐसा करते हैं तो उसका क्या परिणाम होगा। सदस्य संभवतः जानते होंगे कि यहां ऐसे कई व्यक्ति हैं जो शैक्षिक व बौद्धिक दृष्टि से स्नातकों के मुकाबले कहीं अधिक सक्षम हैं, जबकि वे कभी किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में नहीं पढ़े। ऐसे कई व्यक्ति हैं। क्या आप ऐसे लोगों को सदन में आने से रोकना चाहते हैं, जिन्होंने निजी रूप से स्वयं को शिक्षित किया है और जो स्नातक या स्नातकोत्तर व्यक्तियों के समान