20. संसद तथा राज्यों के विधानमंडलों में निर्वाचन के लिए अर्हताएँ - Page 175

160 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

या इनसे अधिक सक्षम हैं, और आप उन्हें केवल इसलिए इस सदन मे आने नहीं देना चाहते क्योंकि वे किसी विश्वविद्यालय से प्रमाणपत्र हासिल नहीं कर पाए? मुझे लगता है कि इसका परिणाम बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

अब एक अन्य परिणाम को लीजिए। हमारे देश में शिक्षा निम्नतम स्तर में है। ऐसा कई कारणों से है जिसे हम सब जानते हैं, हमारे देश में शिक्षा का प्रसार सभी समुदायों में समान रूप से नहीं है। यहां कुछ समुदाय को उच्च अर्हता प्राप्त हैं जबकि कुछ समुदायों में शिक्षा का स्तर बहुत ही कम है। मान लीजिए कि आप स्नातक या केवल दसवीं को ही मानण्ड निर्धारित करते हैं, तो क्या आप इस सदन की सदस्यता पर एक ही समुदाय का एकाधिकार स्थापित नहीं कर रहे। मुझे भय है परिणाम यही होंगे। मान लीजिए आप अपने स्तर को कम कर देते हैं, उदाहरण के लिए लिखने-पढ़ने-कामचलाऊ गणित के ज्ञान या साक्षर होने को मानदण्ड मानते हैं ताकि कोई भी समुदाय इस सभा में अपने सदस्यों को भेजने के अवसर से वंचित न रहे। क्या यह अर्हता किसी भी तरह ठीक है? यह किसी काम की नहीं है।

अतः मेरा निवेदन है कि यह अच्छी बात है। मैं इस भावना का इस सदन में अपने निर्वाचन-क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी सदस्यों को शिक्षित होना चाहिए, विरोध नहीं कर रहा। किन्तु मैं समझ नहीं पा रहा कि आप इसे विधि का रंग कैसे दे सकते हैं। अतः मेरा सुझाव है कि यह एक ऐसा विषय है जिसे लोगों या सरकार चलाने वाले राजनैतिक दलों पर ही छोड़ना बेहतर है। मुझे इसमें कतई संदेह नहीं है कि यदि राजनैतिक दल अपने विशेष प्रयोजनों के लिए इस विषय पर ध्यान न देंगे तो ही कालांतर में जनता स्वयं इस पर ध्यान देगी। जनता उन लोगों को, जो इस सदन में अपना कार्य समुचित ढंग से नहीं कर सकते, इस सदन में बने रहने की अनुमति नहीं देगी और उन्हें हमेशा के लिए वापस बुला लेगी। जनता काम चाहती है, लोग चाहते हैं कि उनके हितों का ध्यान रखा जाए तथा मुझे पूरा विश्वास है कि जनता यह समझेगी कि इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए एकमात्र उपाय यह है कि वे इस सदन में अच्छे से अच्छे व्यक्तियों को चुनकर भेजें। अतः मैं समझता हूँ कि इसका उपयुक्त उपाय यह है कि इस विषय को जनता पर छोड़ दिया जाए।

अब, महोदय, मेरे मित्र प्रो. के.टी. शाह ने निराश होकर कहा कि वे इस प्रस्ताव की नियति जानते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि यह प्रस्ताव गुणा-व-गुण के आधार पर बुरा है। अपितु ऐसा इसलिए है कि वे इस प्रस्ताव को लाए हैं। मैं अपने मित्र प्रो. के. टी. शाह को भरोसा दिलाना चाहता हूँ कि मेरे मन में उनके पति कोई निजी पूर्वाग्रह नहीं है और निश्चित तौर पर मैं ऐसा व्यक्ति भी नहीं हूँ कि किसी के द्वारा लाए गए प्रस्ताव को इसलिए अस्वीकार कर दूँ कि मैं उससे सहमत नहीं हूँ या मैं उन्हें पसंद नहीं करता। इस सदन में ऐसे कई व्यक्ति हैं जिनके निजी पूर्वाग्रह हैंµया शायद उनके बीच व्यक्तिगत