22. भारतीय टैरिपफ (चतुर्थ संशोधन) विधेयक - Page 181

166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है। प्रिवी कौंसिल ने इस निर्णय को उलट दिया था और मैं प्रिवी कौंसिल के पृष्ठ 291 पर दिए गए निर्णय के एक छोटे-से अनुच्छेद को यहां उद्धृत करूँगा। प्रिवी कौंसिल ने यह कहा थाµ

फ्तर्क दिया गया कि प्रश्नागत कर राज्यपाल द्वारा लगाया गया है कि न विधायिका द्वारा, जबकि केवल उसी के पास इस कर को लगाने की शक्ति थी। किन्तु सपरिषद आदेश के अन्तर्गत, शुल्क वास्तव में उस अधिनियम के प्राधिकार से लगाए जाते हैं, जिसके अन्तर्गत यह आदेश जारी किया जाता है। विधायिका का राज्यपाल पर पूरा नियंत्रण है तथा उसे राज्यपाल को सौंपी गई किसी भी शक्ति को वापिस ले या उसमें परिवर्तन करने की पूरी शक्ति है। इन परिस्थितियों में माननीय न्यायमूर्तियों का मत है कि 1879 के कस्टम रैगुलेशन एक्ट की धारा 133 को विधायिका की शक्तियों से परे घोषित करने का उच्चतम न्यायालय का निर्णय गलत था।य्

पं. बालकृष्ण शर्माः महोदय, क्या मैं निवेदन कर सकता हूँ.........।

माननीय अध्यक्षः आइए, हम उन्हें ध्यान से सुनें। यदि इस विषय में कुछ कहने को है, तो मैं माननीय सदस्य की बात सुनना चाहूंगा।

डॉ. एस.पी. मुकर्जी (पं. बंगाल)ः यह कौन-सा देश है?

डॉ. अम्बेडकरः यह आस्ट्रेलिया में कोई उपनिवेश है। यदि माननीय मित्र इस विषय में अधिक जानकारी पाने के इच्छुक हैं, तो मैं उन्हे यह सूचना दे दूंगा।

श्री त्यागीः यह कोई बहुत ही छोटा देश होगा।

डॉ. अम्बेडकरः विधि छोटी या बड़ी नहीं होती। विधि तो विधि होती है। वह देश न्यू साउथ वेल्स है।

इस प्रकार जहां तक पहले प्रश्न का संबंध है कि क्या संसद शक्तियाँ प्रत्यायोजित कर सकती हैं, मेरा निवेदन यह है। जहां तक इस शर्त का पालन किया जाए अर्थात् संसद द्वारा ऐसे किसी प्रत्यायोजित को वापिस लेने की शक्ति को अपने पास रखा गया है, इसमें कोई विधिक आपत्ति नहीं हो सकती।

इससे पहले कि मैं दूसरे मुद्दे पर पहुंचू, मैं यह कहना चाहूँगा कि इस प्रश्न पर निर्णय करने के लिए यह सदन किस प्रकार सक्षम है। निश्चित रूप से यह व्यवस्था का मुद्दा नहीं है। व्यवस्था का मुद्दा क्रियाकलापों के नियमों से संबंधित होता है। हम यहाँ इस सदन की सक्षमता की बात कर रहे हैं। मान लीजिए आप या यह सदन निर्णय करता है कि यह अधिकारातीत है तथा इसके बावजूद संसद कानून बनाने लगती है और मामला उच्चतम न्यायालय में चला जाता है तथा उच्चतम न्यायालय ने निर्णय देता है कि यह अधिनियम अधिकारातीत नहीं है, तो इससे कितनी मुश्किल स्थिति पैदा होगी? अथवा मान लीजिए