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का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। निर्वाचन मण्डल के इस प्रश्न पर विचार करते हुए सदन को याद होगा कि उच्च सदन के गठन के लिए संविधान ने साधारण सिद्धान्त निर्धारित किया है। यह सिद्धान्त अनुच्छेद 80, खंड (4) में मिलेगा। यह खंड बताता है कि यद्यपि इसे भाग ‘क’ और भाग ‘ख’ राज्यों के प्रतिनिधित्व तक सीमित रखा गया है, फिर भी उच्च सदन में प्रतिनिधित्व ‘क’ और भाग ‘ख’ राज्यों के विधानमंडलों के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा होगा। ऐसा होने पर, उच्च सदन में भाग ‘ग’ राज्यों का प्रतिनिधित्व प्राप्त करने की पद्धति खोजने के लिए उक्त सिद्धान्त को अर्थात् अप्रत्यक्ष पद्धति द्वारा प्रतिनिधित्व का अनुसरण करना आवश्यक व बाध्यकारी है। अब इस पद्धति का अनुसरण करने में शुरू में ही एक कठिनाई है।
12.00 बजे दोपहर
जहाँ तक भाग ‘क’ और भाग ‘ख’ राज्यों का संबंध है_ पहले से ही एक निर्वाचक मण्डल, अर्थात् भाग ‘क’ और भाग ‘ख’ राज्यों के विभिन्न भागों में विधानसभाएं हैं, जहाँ तक भाग ‘ग’ राज्यों का प्रश्न है वहां ऐसी कोई विधानसभा मौजूद नहीं है तथा कोई यह नहीं जानता कि भाग ‘ग’ राज्यों के प्रशासन विषयक सुप्रसिद्ध पद्धति का उपबंध करने के लिए संसद कब किस प्रकार का कानून बनाएगी। फलतः हमें इस परिकल्पना पर कार्रवाई करनी चाहिए कि भाग ‘ग’ राज्यों में न तो विधायिका निकाय है और न चुनाव होने तक इनके अस्तित्व में आने की संभावना है। इस प्रकार, प्रश्न यह है कि निर्वाचन मण्डल का स्वरूप कैसा हो। स्पष्टतः यदि किसी के मस्तिष्क में कोई अन्य पद्धति आती है तो उसके लिए सभी भाग ‘ग’ राज्यों की वर्तमान स्थानीय निकाय जैसे नगरपालिकाऐं नगर समितियों, ग्राम पंचायतों और इस प्रकार के अन्य निकायों का सहारा लिया जाए इन स्थानीय निकायों के सदस्यों को मतदाताओं के रूप में रजिस्ट्रीकृत करने की अनुमति दी जाए। तथापि यह पाया गया है कि संभवतः इस प्रकार की निर्वाचन पद्धति बड़े-बड़े निर्वाचन-क्षेत्र उपलब्ध नहीं करा सकती। हमें यह जानकारी नहीं है कि विभिन्न भाग ‘ग’ राज्यों में कितनी नगरपालिका समिति, नगरक्षेत्र समिति और ग्राम पंचायतें हो सकती हैं। भाग ‘ग’ राज्यों के कुछ भागों में इनकी संख्या अधिक हो सकती है और भाग ‘ग’ राज्यों के कुछ भागों में इनकी संख्या कम हो सकती है। फलतः सशक्त निर्वाचक मण्डल तैयार करने के लिए यह महसूस किया गया कि इन स्थानीय निकायों की सदस्यता के अतिरिक्त यह वांछनीय होगा, यदि मताधिकार का उपयोग उस व्यक्ति को भी करने दिया जाए जो किसी विश्वविद्यालय की परीक्षा दे रहा है। अतः स्थानीय निकायों की सदस्यता के अतिरिक्त इस विधेयक में यह प्रस्ताव है कि मैट्रिक अथवा समतुल्य शैक्षिक योग्यता रखने वाले व्यक्ति को मतदाता के रूप में पंजीकृत किए जाने की भी अनुमति प्रदान की जाए बशर्ते कि वे अर्हक तिथि को आवश्यक शैक्षिक योग्यता रखते हों तथा अर्हक अवधि के दौरान आवश्यक अवधि में वहाँ रहे हों। यह साधारण