4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(2)
* कानूनी विधि पुनरीक्षण समिति की नियुक्ति
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री) ः अध्यक्ष महोदय, मैं तुरन्त यह कहना चाहूँगा कि प्रस्तावक का उद्देश्य बहुत प्रशंसनीय है और उसके द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव में मेरी पूरी सहानुभूति उनके साथ है। श्रीमान् जी, इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आधुनिक समाज में विधि का आवधिक पुनरीक्षण परम आवश्यक है। जब कोई जन विधानमंडल उसके द्वारा शासित समाज के प्रत्येक पहलू को स्पर्श करते हुए स्वयं को विधायी कार्य में लगा लेता है तो कतिपय समस्याओं का उत्पन्न होना स्वाभाविक है, जिनकी समीक्षा और सुधार के लिए किसी विशेषज्ञ विधि निकाय का होना आवश्यक होता है। सर्वप्रथम, ऐसा होता है कि किसी कल्पना को विधि का रूप देने के लिए प्रारूपकार कतिपय पदावली का सुझाव देता है जिसे वह विधानमंडल के लेखबद्ध करने आशय के लिए समुचित और पूर्ण समझता है। किसी प्रक्रम पर न्यायपालिका और वृत्ति के सदस्यों को पता चलता है कि प्रारूपकार द्वारा प्रयुक्त पदावली गलत है और वह विधानमंडल के आशय को व्यक्त नहीं करती। इस तरह यह समस्या ऐसी समस्या बन जाती है जिस पर कोई व्यक्ति विचार करे और उसमें सुधार करके मूल आशय के अनुरूप बिठाए प्रायः ऐसा होता है कि जब कोई विधानमंडल लम्बे समय तक विधायी कार्य में लगा रहता है तो कतिपय असंगतियाँ अनजाने में उत्पन्न हो जाती हैं। न वो प्रारूपकार के लिए और न ही विधानमंडल के लिए यह हमेशा संभव होता है कि वह उसके समक्ष लाए गये विधान की के हर अंश की समीक्षा यह पता लगाने के लिए करे कि क्या वह विधान, इसके पूर्ववर्ती अन्य विधान से संगत है। अतः कालांतर में ये असंगतियाँ जमा हो जाती हैं। इनसे अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों को कठिनाई होती है और इनसे मुकदमे लड़ने वाली जनता को भी परेशानी होती है। प्रायः ऐसा भी होता है कि आधुनिक समय में, जब विधान-मंडल इतना अधिक व्यस्त रहता है कि वह किसी विशिष्ट विषय पर पूर्ण विधि को संहिताबद्ध करने के लिए अपना पूरा समय देने में असमर्थ रहे तो वह अपने उत्तरदायित्वों को निर्वहन आंशिक और खंडःविधान अपनाकर करता है। समय के साथ इस खंड और आंशिक विधान के इकट्ठा को जाने से पुनः समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। जनता यह नहीं समझ पाती कि विधि क्या है और परिणामतः संहिताकरण की समस्या उत्पन्न हो जाती है। अतः यह सुझाव देने के लिए विशेष अभिवचन की आवश्यकता नहीं है कि एक कानूनी विधि पुनरीक्षण समिति की आवश्यकता है। मैं समझता हूँ कि भारत सरकार ने बहुत पहले कानूनी विधि पुनरीक्षण समिति की आवश्यकता को स्वीकार कर लिया था। वास्तव में, जैसे ही मॉन्टेग चैम्सफोर्ड सुधार क्रियान्वित किए गए और जब यह पता चला कि जन विधानमंडल है और इस बात की अधिक संभावना है कि
ऽसं. स. (वि.) वा. खंड II, 2 दिसंबर, 1947, पृष्ठ 1103-05