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वह पूर्व विधानमंडल की तुलना में सामाजिक सुधार संबंधी विधान पर कार्य करेगा तो भारत सरकार ने, समगति से, और मॉन्टेग-चैम्सफोर्ड सुधार लागू करने के साथ-साथ 1921 में कानूनी विधि पुनरीक्षण समिति नाम समिति प्रारम्भ और स्थापित की। अतः मुझे इस अन्तर्निहित प्रयोजन को स्वीकार करने में, जो मेरे आदरणीय मित्र सर हरिसिंह गौड़ के मन में भी है, कोई कठिनाई नहीं है कि कानूनी विधि पुनरीक्षण समिति होनी चाहिए। उनके और मेरे मध्य मतभेद केवल इस बिन्दु
4.00 बजे अपराहन
पर है कि क्या हम ऐसी कानूनी विधि पुनरीक्षण समिति स्थापित करने के लिए तुरन्त कार्यवाही करें जो उनके मन में है अथवा अधिक समुचित समय और अधिक समुचित पद्धति पर विचार करने के लिए यह मामला सरकार पर छोड़ दें जिससे कि उस प्रयोजन को पूरा किया जा सके जो उनके और मेरे मन में है।
जहाँ तक 1921 में स्थापित की गई कानूनी विधि पुनरीक्षण समिति के प्रकार का संबंध है, मैं सदन को उस कार्य के संबंध में बताना चाहूंगा जो उसने किया और क्या वह कुछ बेहतर कार्य नहीं कर सकती थी। कानूनी विधि पुनरीक्षण समिति 1921 में नियुक्ति की गई थी और यह 1932 तक रही। 1932 के पश्चात् वह समाप्त हो गई_ इसका अंत स्वाभाविक रूप से हुआ अथवा अस्वाभिक रूप से हुआ, यह ऐसा मामला नहीं है जिस पर मैं चर्चा प्रस्तावित करूं। किन्तु मैं सदन को यह बताना चाहूँगा कि इन ग्यारह वर्षों के दौरान, जब समिति समय-समय पर सत्र में रही, इसने वाणिज्यिक पोतपरिवहन अधिनियम, आपराधिक जनजाति अधिनियम, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियमय्, वन अधिनियम और पथकर अधिनियम का संहिताकरण किया। अब, महोदय, समिति के कार्य पर किसी प्रकार की टीका टिप्पणी करने के किसी आशय के बिना मैं समझता हूँ कि इस बात पर सभी लोग सहमत होंगे कि ग्यारह वर्षों की अवधि में पांच विधियों का बनाया जाना निश्चित रूप से ऐसा बहुत बड़ा कार्य नहीं है जिसका प्रत्याशा इस प्रकार की समिति से की जा सकती थी। दूसरी ओर, समिति के विघटन के बाद जब उस कार्य को करने का दायित्व जिसे करने के लिए समिति नियुक्त की गई थी, भारत सरकार पर आया तो समिति के कार्य में किसी प्रकार की टीका-टिप्पणी किए बिना भारत सरकार के विधायी विभाग को इसका श्रेय दिए बिना मैं फिर यह कहूँगा कि समिति के विघटन के पश्चात् माल विक्रय अधिनियम, 1930, भागीदारी अधिनियम, 1932, कारखाना अधिनियम, 1934, टैरिफ अधिनियम, 1934, पैट्रोलियम अधिनियम 1934, बीमा अधिनियम 1938, मोटर यान अधिनियम, 1938 और माध्यस्थम अधिनियम, 1940 बनाए गए। इन अधिनियमों के बारे में जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति यह स्वीकार करेगा कि इनमें से प्रत्येक बहुत बड़ा विधान है। कानूनी विधि पुनरीक्षण समिति, जिससे यह आशा की जाती थी कि वह अपना वचन पूरा करेगी, इसे पूरा करने में क्यों असफल रही, इसका कारण