24. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 191

176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहती थी। जैसाकि मैंने तब कहा था कि परिस्थितियों की जांच करने पर यह पाया गया था कि कुछ क्षेत्रों की मतदाता सूची तैयार नहीं थी और कुछ क्षेत्रों में निर्वाचन-क्षेत्रों की परिसीमाकन नहीं हो पाया था। यदि हम लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में अंतिर्विष्ट मूल उपबंधों को स्वीकार कर लें, तो स्थिति क्या होनी चाहिए? यह स्थिति इस प्रकार होनी चाहिए। मूल अधिनियम के अंतर्गत चुनाव आयुक्त प्रारंभिक मतदाता सूचीµमैं फ्प्रारंभिक मतदता सूचीय् शब्द का उपयोग निर्वाचन क्षेत्र-वार कर रहा हूँ। चुनाव प्रक्रिया में यह प्रथम चरण था। इस चरण की समाप्ति के बाद दो अथवा तीन प्रक्रियाओं से गुजरना था। उनमें से प्रथम चरण था दावों और आपत्तियों को आमंत्रित करना और द्वितीय चरण-प्राप्त दावों और अभ्यावेदनों पर न्यायिक अथवा अन्य प्राधिकार द्वारा विचार करना तथा उनको निपटाना और तीसरे चरण में मतदातासूचियों में संशोधन करने वाले प्राधिकारी के निर्णय के परिणामस्वरूप होने वाली शुद्धियों को दर्ज करना और अंत में उनको प्रकाशित करना था।

उस क्षण बोलते हुए और उस समय के बारे में विचार करते हुए जो इन प्रक्रियाओं से गुजरने के लिए आवश्यक हो गया था, स्थिति यह होनी चाहिए थी। निर्वाचन-क्षेत्रों का सीमांक किए जाने के बाद, मतदाताओं को उनके दावों और आपत्तियों के लिए कम से कम तीन सप्ताह अथवा एक माह का समय अवश्य दिया जाना चाहिए था। आप स्पष्ट तौर पर उक्त समय से कम समय नहीं दे सकते थे। उसके बाद संशोधन करने वाले प्राधिकारी के लिए कम से कम दो महीने आवश्यक होंगे, मैं बहुत ही रूढि़वादी अनुमान दे रहा हूँ क्योंकि संशोधन करने वाले प्राधिकारी को दावों और आपत्तियों को निपटाने के लिए दो महीने आवश्यक होंगे। इसका अर्थ है तीन माह। संशोधन करने वाले प्राधिकारी के निर्णय को ध्यान में रखते हुए मतदाता सूचियों में संशोधन करने के लिए एक माह का समय और लग सकता है। इसका अर्थ है चार माह। यह मानते हुए कि प्रारंभिक मतदाता सूचियां इस माह के आखिरी तक तैयार कर ली जाएंगी जिसे मैं नहीं समझता कि इसके प्रति अधिक आशावान नहीं हुआ जा सकताµपरन्तु माने ऐसा हुआµयह एकदम स्पष्ट है कि मूल लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में सम्मिलित सिद्धान्तों के अनुसरण में अन्तिम मतदाता सूचियों का प्रकाशन अप्रैल अथवा मई माह की समाप्ति तक भी नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ है कि यदि हम मूल अधिनियम के उपबंधों का हू-ब-हू अनुसरण करते हैं तो चुनाव अप्रैल और मई में नहीं हो सकते। क्योंकि सरकार अप्रैल और मई में चुनाव कराने की इच्छुक थी, सरकार ने महसूस किया कि यह सिर्फ तभी संभव हो सकता है जब उक्त प्रक्रिया को उलट दिया जाए। यदि दावे और आपत्तियां यूनिटों अथवा क्षेत्रों के लिए तैयार की गई मतदाता सूचियों के आधार पर आमंत्रित की जातीं और उन्हें निपटाया जाता और उनके निपटाए जाने के बाद निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर मतदाता सूचियां बनाई जातीं, तो निर्वाचन क्षेत्र-वार मतदाता सूचियां तैयार करने के बाद उस समय