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का उपयोग किया जाता जिसका उपयोग यदि प्रारंभ में किया जा सकता तो दावों और आपत्तियों और संशोधन विषयक प्रक्रिया से छुटकारा पाया जा सकता था और अप्रैल व मई के माह में चुनाव कराना संभव हो सकता था। यह इस दृष्टिकोण होता कि सरकार ने महसूस किया कि इस प्रक्रिया को उलटा कर दिया जाए, इसका अर्थ है कि दावे और आपत्तियां प्रारंभिक मतदाता सूचियों के आधार पर आमंत्रित की जाएं तो क्षेत्र के आधार पर तैयार की गई हों, न कि निर्वाचन-क्षेत्रों के आधार पर।
वही सब कुछ इस अध्यादेश ने किया। अब यह पूछा जाए कि जबकि चुनाव स्थगित कर दिए गए हैं, क्या इस अध्यादेश को जारी किया जाना अपेक्षित है? इसका उत्तर साधारण है। मतदाता सूचियाँ तैयार करने के संबंध में चुनाव आयोग द्वारा किए जाने वाले कार्य का बहुत बड़ा भाग पहले ही किया जा चुका है और यदि यह विधेयक कानून नहीं बनता है तो वे सारे कार्य छोड़ने पड़ेंगे और चुनाव आयुक्त को अपना सारा कार्य नए सिरे से शुरू करना पड़ेगा। (एक माननीय सदस्यः पीछे लौटना) जैसा कि मेरे मित्र ने कहा है, मैं नहीं समझता कि सदन इस बात के लिए इच्छुक होगा कि ऐसा होना चाहिए। मैं सिर्फ समय के प्रश्न पर ही विचार नहीं कर रहा हूँ बल्कि उस धन की भी बात कर रहा हूँ जो सरकार पहले से किए गए कार्य पर खर्च कर चुकी है। हमने इस विधेयक में इस बात का ध्यान रखा है कि इस अध्यादेश के उपबंध केवल प्रथम चुनावों के लिए ही लागू होंगे ताकि बाद में होने वाले चुनावों में मुख्य अधिनियम के उपबंध चुनाव कराने और मतदाता सूचियां तैयार करने में लागू होंगे। इसीलिए इस अध्यादेश को जारी करने के लिए हम सदन की अनुमति ले रहे हैं।
इस विधेयक के अन्य उपबंध पूर्णतया संगत हैंµअर्हक तारीख और अर्हक अवधि में परिवर्तन इत्यादि। मैं नहीं समझता कि इस पर मुझे सदन को रोकने की आवश्यकता है। सदन स्वयं देख लेगा कि वे क्या संशोधन हैं।
माननीय अध्यक्षः प्रस्ताव रखा गयाः
फ्कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 का संशोधन करने के इस विधेयक पर विचार किया जाए।
ऽश्री सरवटे (मध्य प्रदेश)ः मैं इस संबंध में संविधान के अनुच्छेद 240 का उल्लेख करना चाहूँगा जो यह कहता है कि फ्यथा संभव शीघ्र............य्
डॉ. अम्बेडकरः फ्यथासंभव शीघ्रय् कहाँ हैं?
श्री सरवटेः जब यह अनुच्छेद बनाया गया था तब इससे यह अभिप्रेत था।
ऽसं. वा., खंड 7, भाग II, 13 दिसंबर, 1950, पृष्ठ 1711