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मण्डल का सृजन करने पर बल देने के लिए सहमत हो तथा सदन इन निर्वाचक मण्डलों को उन प्रतिनिधियों, जिनको संविधान की अनुसूची 4 द्वारा आबंटित किए गए हैं, की सहायता करने की अनुमति दे। चुनाव द्वारा उच्च सदन में प्रतिनिधियों को भेजने के प्रयोजन से सृजित निर्वाचक मण्डल की यह प्रणाली मणिपुर व त्रिपुरा तक बढ़ाने भी दिए जाने का प्रस्ताव है।
जहाँ तक इस विधेयक के दूसरे भाग का सवाल है अर्थात् जो अध्यादेश के अधिनियम से संबंधित है, वह रहेगा और जहां तक इस विधेयक से संबंधित उपबंधों पर दूसरे दिन हुई बहस का सवाल है, मैं नहीं मानता कि सदन ने इस विधेयक के उस भाग का किसी तरह विरोध किया। अतः मैं नहीं समझता कि ऐसी स्थिति में श्री कामथ को अपने संशोधन के लिए विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने की आवश्यकता है। अतः स्पष्ट है कि जो समय और तारीख उन्होंने अपने संशोधन के लिए निर्धारित किए थे, वह पहले ही समाप्त हो चुके हैं। फलतः उनके संशोधन का आधार पहले ही सम्मिलित किया जा चुका है परन्तु उसके अतिरिक्त यदि उस दिन मुझे यह कहने में सन्देह नहीं होता कि इस तथ्य के मद्देनजर उक्त संशोधन स्वीकार करना संभव नही है क्योंकि अध्यादेश से संबंधित विधेयक के उपबंध उतने अत्यावश्यक थे कि अविलंब उनका कानून बनाया जाना था जिसकी संविधान हमसे अपेक्षा करता है। अतः मैं अनुरोध करता हूँ कि प्रवर समिति को भेजे बिना इस विधेयक पर विचार किया जाए तथा संशोधित समेकित सूची की अनुपूरक सूची सं. 6 में जिस संशोधन का मैंने प्रस्ताव किया है उस पर विचार किया जाए।
माननीय अध्यक्षः मैं सदन के समक्ष प्रस्ताव रखता हूँ। मुझे विश्वास है कि लम्बी चर्चा के बाद अब इस विधेयक पर और अधिक चर्चा करना आवश्यक नहीं रह गया है। मैं इसका एक-एक खंड प्रस्तुत करूँगा और सामान्य चर्चा करने के बजाय माननीय सदस्यों को सदन में प्रस्तुत खंड पर अपनी बात कहने का अवसर मिलेगा। अब हम विशेष रूप से उन खंडों पर विचार करेंगे जिन पर सदस्यों को कोई आपत्ति हो।
ऽमाननीय अध्यक्षः जैसा कि विभिन्न खंडों में परिवर्तनों का प्रस्ताव है, माननीय सदस्य इस बात का ध्यान रखेंगे कि मैं कोई संशोधन न छोड़ दूँ।
खंड 2 (दीर्घ शीर्षक का संशोधन)
संशोधन किया गया।
खंड 2 के स्थान पर निम्नलिखित रखा जाएः
फ्2. 1950 के अधिनियम XLIII दीर्घ शीर्षक का संशोधन-लोक प्रतिनिधित्व
ऽसं. वा., खंड 7, भाग II, 21 दिसंबर, 1950, पृष्ठ 2212