2. संविधि पुनरीक्षण समिति की नियुक्ति - Page 21

6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

समिति की रचना और गठन में एक बड़ा दोष था। सर्वप्रथम, समिति में छह सदस्य थे_ वे अधिकतर विधानमंडल के सदस्यों में से निर्वाचित किए गए थे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि निर्वाचित सदस्यों को पूर्णतया उनके विधिक ज्ञान और कानूनी विद्ग्धता के आधार पर निर्वाचित किया गया था, किंतु मेरी राय में यह मात्र संयोग था। समिति का अध्यक्ष, राज्य परिषद का सभापति था। यह मेरी समझ से बाहर है कि राज्य परिषद के सभापति को इस समिति का अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के पीछे क्या औचित्य था, जिसके लिए जैसा कि हम सभी जानते हैं, विशेष विधिक ज्ञान अपेक्षित था।

समिति के संबंध में दूसरी कठिनाई यह थी कि इसके सदस्य वैतनिक नहीं थे। मैं यह नहीं कहना चाहता कि यदि सदस्य वैतनिक न हों तो वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन इस प्रकार नहीं करते हैं जैसी अपेक्षा सभी लोगों से निष्ठापूर्वक की जाती है। किंतु ऐसा ही हुआ और यह सत्य है कि समिति की बैठक कभी-कभी ही होती थी। समिति के सदस्य, विधानमंडल में से लिए जाने के कारण, केवल सत्र के दौरान ही बैठक करते थे और जब उनसे यह कहा जाता था कि चूंकि वे दिल्ली में उपस्थित हैं इसलिए वे अपना कुछ समय कानूनी विधि पुनरीक्षण समिति के सदस्य के रूप अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए निकालें तो वे सब यही कहा करते थे कि समिति के कार्य से उनका विधायी कार्य अधिक महत्वपूर्ण है। सत्र की समाप्ति पर वे सभी स्वभाविक रूप से अपने व्यक्तिगत या वृत्तिक कर्तव्यों के निर्वहन क लिए अपने-अपने घर वापस चले जाते थे। परिणामतः समिति इतना समय नहीं दे पाती थी जिसकी उससे आशा की जाती थी। अब, निश्चित रूप से मेरे आदरणीय मित्र सर हरि सिंह गौड़ इस बात से समहत होंगे कि यदि उनके प्रयोजन को क्रियान्वित किया जाना हो तो हमें बिल्कुल अलग ही तरह की समिति बनानी होगी। पहले जैसी समिति बनाए जाने से कुछ हासिल नहीं होगा, जिसके कारणों का उल्लेख मैं कर चुका हूँ क्योंकि वह उन कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर पाई, जो उसे सौंपे गये थे।

महोदय, अब मेरी राय में इस संबंध में आगे बढ़ने के दो रास्ते हैं। सर्वप्रथम, हमें एक स्थायी आयोग बनाना चाहिए जो कानून के संहिताकरण और पुनरीक्षण के अलावा किसी अन्य प्रयोजन के लिए बैठक नहीं करेगा। दूसरे, यदि यह एक स्थायी निकाय होगा तो निस्संदेह यह ऐसे विशेषज्ञों का निकाय होगा जो अपने कार्यों में निपुण हों। और मैं समझता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति इस बात से सहमत होगा कि यदि विशेषज्ञों को उनकी वृत्ति से अलग किया जाएगा तो हमें उन्हें बुलाने और समिति में उनकी सेवा लेने का मूल्य समझना होगा। निश्चित रूप से यह लागत का विषय है। ऐसा होने पर मेरे लिए यह संभव नहीं होगा कि मैं सुझाव दूँ कि खर्च के प्रश्न पर विचार किए बिना तुरंत और अभी यह कहें कि हम किसी भी प्रकार की कानूनी विधि पुनरीक्षण समिति की नियुक्ति के लिए सहमत होंगे चाहे इसका सुझाव सर हरिसिंह गौड़ द्वारा दिया जाए या विधानमंडल के किसी अन्य सदस्य के द्वारा।