188 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उपबंधों के साथ रखकर पढ़ा जाए जिन्हें इस सदन ने राज्यसभा (उच्च सदन) के भाग ‘ग’ राज्यों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए उपबंध करने के प्रयोजन से अभी-अभी पारित किया है, तो इसमें कुछ विसंगति प्रतीत होगी। इसके अंतर्गत हम वयस्क मताधिकार द्वारा निर्वाचित निर्वाचक मंडल बना रहे हैं। यहां हम इस विधेयक में उल्लिखित मूल योजना को बनाए रख रहे हैं, जैसे, यह कि प्रतिनिधित्व स्थानीय प्राधिकरणों के माध्यम से अप्रत्यक्ष तरीके से होना चाहिए, लेकिन मैं नहीं समझता कि इस प्रस्ताव को स्वीकार करने में यह कोई बहुत बड़ी आपत्ति है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि आज सुबह मेरे माननीय मित्र श्री देशबन्धु गुप्ता ने हमें बताया था कि ये सभी निकाय बहुत शीघ्र लोकतांत्रिक होने जा रहे हैं और इनके वयस्क मताधिकार द्वारा निर्वाचित होने की संभावना है। इस बात को ध्यान में रखते हुए मुझे इसमें कोई खास बात नजर नहीं आती, चाहे आप निर्वाचन के लिए नगरपालिका या स्थानीय बोर्ड का मामला लें अथवा चाहे आप और नीचे चले जाएं तथा इस मामले को और अधिक घुमा दें और निर्वाचन का आधार बना दें। अतः मूल रूप से मुझे उनके प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नहीं है।
इसके अतिरिक्त, दो अन्य बाते हैं जिनका मैं हवाला देना चाहूंगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि वह स्थानीय प्राधिकरणों को निर्वाचन का हथियार बना रहे हैं, यह प्रतीत होता है कि दिल्ली प्रांत में कुछ स्थानीय प्राधिकरण हैं जहाँ सदस्यों का निर्वाचन नहीं होता है बल्कि उनका नामांकन किया जाता है। उदाहरण के लिए नई दिल्ली नगरपालिका का मामला लें, मैं समझता हूँ कि इसमें अधिकांशतः नामांकन ही किया जाता है और मैं यह नहीं मानता कि मेरे माननीय मित्र श्री देशबन्धु गुप्ता इस बात पर जोर देंगे कि दिल्ली नगरपालिका के लिए नामित व्यक्ति यद्यपि उनका निर्वाचन वयस्क मताधिकार द्व ारा नहीं किया गया है, ज्ञान की दृष्टि से, नागरिक सामान्य ज्ञान की दृष्टि से किसी भी मामले में अन्य नगरपालिकाओं द्वारा निर्वाचित व्यक्तियों से कम है। अतः मैं सुझाव देना चाहूँगा कि मैं उनके संशोधन को स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ बशर्ते कि वे अपने खंड से ‘निर्वाचित’ शब्द हटा दें।
दूसरा सुझाव मैं उनको यह देना चाहूंगा, जो मैं समझता हूँ, केवल प्रारूपण (ड्राफिटंग) कुशलता का मामला है, वह यह है कि अच्छा रहेगा कि उनका यह प्रस्ताव परन्तुक के स्थान पर धारा 27 क की उप-धारा (5) के अंतर्गत रखा जाए। मैंने पूरे मामले को पढ़ा है। मुझे प्रतीत होता है कि इसे इसके अधीन उप-धारा (5) के अंतर्गत रखा जाना अधिक उपयुक्त होगा। मुझे इसे स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है।
श्री देशबन्धु गुप्ताः महोदय, क्या मैं उल्लेख कर सकता हूँ कि मैं माननीय मंत्री से एक स्पष्टीकरण चाहता हूँ कि जब वे कहते हैं कि मैं ‘निर्वाचित’ शब्द हटाने पर सहमत हो जाऊं, क्या वे यह मानते हैं कि अन्य स्थानीय निकायों में भी नाकांकन बहुत बड़ी तादात में होता है? यदि विचार केवल नई दिल्ली के प्रतिनिधित्व का है जो