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कि पूरी तरह से नामित निकाय है, तब यह उद्देश्य नई दिल्ली नगरपालिका समिति के गैर-सरकारी सदस्यों को लेने से अच्छी तरह पूरा हो जाएगा। वहां सात या आठ सदस्य होते हैं। पुरानी दिल्ली में 50 निर्वाचित तथा 10 नामित सदस्य हैं। शाहदरा में 10 निर्वाचित तथा 5 नामित सदस्य हैं। क्या वे चाहते हैं कि इन सभी नामित सदस्यों को मताधिकार दिया जाना चाहिए?
डॉ अम्बेडकरः मैं नहीं समझता कि कोई विभेद किया जाना चाहिए।
श्री देशबंधु गुप्ताः मैं ‘निर्वाचित’ शब्द पर अडिग हूँ। लेकिन मैं नई दिल्ली नगरपालिका के गैर-सरकारी सदस्यों को शामिल किए जाने के लिए तैयार हूँ।
डॉ. अम्बेडकरः ठीक है।
ऽमाननीय अध्यक्षः इसलिए तब, मुझे डर है, चर्चा का रुख देखते हुए मुझे श्री देशबंधु गुप्ता के संशोधन को सदन के समक्ष रख देना चाहिए।
डॉ. आर.यू सिंहः किन्तु महोदय मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला है। मैं दो बातें जानना चाहता था। वह आधार क्या है जिसके अनुसार विधान परिषदों का चुनाव किया जाएगा। क्योंकि ऐसे सदस्यों का निर्वाचन करने वालों की संख्या बहुत ही कम होगी। और दूसरे क्या माननीय मंत्री इस स्थिति पर पुनः विचार करने के मेरे उन मुद्दों पर जोर दिए जाने की कृपा करेंगे। जैसाकि मैंने कहा था कि वह मूलतः गलत है और यह खिचड़ी व्यवस्था है जिसके लिए कोई औचित्य नहीं है। मैं जानना चाहूंगा कि डॉ. अम्बेडकर का क्या कहना है।
माननीय अध्यक्षः क्या माननीय विधि मंत्री ने उस बिन्दु को समझ लिया है जिसे मानीय सदस्य उठा रहे हैं?
डॉ. अम्बेडकरः कुछ माननीय सदस्य हमेशा रहे हैं कि मैं मंत्रिमंडल में कठोरतम व्यक्तियों में से हूं। मैं कठोर व्यक्ति होने का लाभ अब समझ रहा हूँ। सभी लोगों की बात मानने से आदमी परेशानी में फंस जाता है जैसा कि मैं स्वयं को इस समय पा रहा हूं। यदि मैं मूल स्थिति पर अडिग रहा होता तो संभवतः मैं उस परेशानी में नहीं पड़ता जिसमें मैं अब स्वयं को पा रहा हूं।
निःसन्देह इस आश्वासन पर इस स्थिति को स्वीकार कर लेने के बाद इन नगर निकायों के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होने जा रहे हैं, मैं नहीं समझता कि मेरे मित्र श्री देशबंधु गुप्ता द्वारा दिए गए सुझाव को स्वीकार करने के पीछे कोई बहुत बड़ा सिद्धांत है।
ऽसं. वा., खंड 7, भाग II, 21 दिसंबर, 1950, पृष्ठ 2236-44