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इस प्रयोजन को व्यवहार में लाने का एक और मार्ग भी है। यह भारत सरकार के विधि मंत्री, फेडरल न्यायालय के एक न्यायाधीश, भारत के महाधिवक्ता, भारत में उच्च न्यायालयों के एक या दो न्यायाधीशों और दो या तीन सुप्रसिद्ध वकीलों से मिलकर बनी एक लघु स्थायी समिति की नियुक्ति से हो सकता है। समिति से वर्ष की नियत अवधियों पर बैठकें करने के लिए कहा जा सकता है और सूचना एकत्रित करने तथा उसे समिति के समक्ष रखने के लिए भारत सरकार के विधि विभाग से सचिव के रूप में कार्य करने क लिए किसी व्यक्ति को प्रतिनियुक्त किया जा सकता है जिससे समिति यह तय कर सके कि क्या किया जा सकता है।
मेरे विचार में, इस प्रयोजन को कार्य रूप देने के लिए ये विभिन्न उपाय हैं। जैसा कि मैंने कहा, इसके लिए समय और परीक्षण अपेक्षित है और सरकार के लिए, जो सभी प्रकार की अनन्त समस्याओं से घिरी हुई है, इस कार्य के लिए समय निकालना संभव नहीं है। यद्यपि उसे ऐसा करना होगा यदि मैं सर हरि सिंह गौड़ के संकल्प को उसी तत्परता से स्वीकार करता हूँ जिससे मुझे विश्वास है इसे प्रस्तुत किया गया था। अतः मेरा सुझाव है कि सर हरि सिंह गौड़ पूर्ण रूप से इस बात को समझेंगे कि जहाँ तक अंतिम प्रयोजन का संबंध है, मेरे और उनके बीच कोई मतभेद नहीं है, हम दोनों ही सहमत हैं कि यह ऐसा मामला है जिस पर भारत सरकार को विचार करना चाहिए। एकमात्र मतभेद है कब और कैसे, और यह ऐसा मुद्दा है जिस पर वह सरकार पर तत्काल कार्यवाही करने के लिए दबाव न बनाएँ अतः मेरा सुझाव है कि क्योंकि मैंने ऐसा उत्तर दिया है, जो उनके मत के आधे से अधिक आधार को पूरा करता है, अतः मैं समझता हूँ कि वह सहमत होंगे कि इसे वापस लेना श्रेयस्कर होगा।
ऽअध्यक्ष महोदयः संशोधन (श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा)ः पेश किया गयाःµ
फ्कि विधेयक के खंड 2 में, प्रस्तावित नई धारा 289 ख मेंय्
(1) (57 और 58 विक्ट, ग 60) शब्द, अंकों, अक्षरों और कोष्ठकों का लोप किया जाए_ और
(2) फ्(57 और 58 विक्ट, ग 60) शब्द, अंक, अक्षर और कोष्ठक हाशिया में अंतः स्थापित किए जाएँ।य्
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः मैं स्थिति स्पष्ट करना चाहूँगा। मेरा कहना है कि संशोधन में कोई सार नहीं है। पहचान करने वाला खंड या तो हाशिया में हो सकता है या स्वयं धारा के पाठ में। सबसे आवश्यक बात यह है कि कुछ पहचान होनी चाहिए। मूलतः यह सत्य है कि सभा में प्रस्तुत किए गए सभी विधेयकों में ऐसे
ऽसं. स. (वि.) वा. खंड II, 2 दिसम्बर, 1947, पृष्ठ 1199-1200