2. संविधि पुनरीक्षण समिति की नियुक्ति - Page 23

8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पहचान-निर्देश हाशिया में दिए गए थे। किन्तु अब मुद्रकों ने निर्देशों को स्वयं धारा के पाठ में देने की पद्धति अपनाई है और इसका प्रयोजन कागज खर्च को कम करना है। उदाहरण के लिए, जब निर्देश हाशिया में दिए जाते हैं तो निश्चित रूप से अधिक कागज का प्रयोग करना होगा। युद्ध प्रारम्भ होने के पश्चात् से कागज के प्रयोग को कम करने के लिए इस पद्धति को अपनाया गया। मेरे विचार में, इससे न तो प्रारूपण से संबंधित सिद्धांतों का उल्लंघन होता है और न ही हाशिया टिप्पणी के संबंध में किसी अन्य विधि का उल्लंघन होता है। वास्तविकता तो यह है कि हाशिया टिप्पणी अनावश्यक हैं और इन्हें मुद्रित किया जाना आवश्यक नहीं है।

श्री सुरेश चन्द्र मजूमदार (पश्चिमी बंगालः साधारण)ः ‘आंतरिक हाशिया’ टिप्पणी जैसी चीजें से कागज बर्बाद नहीं होता।

ऽऽमाननीय अध्यक्षः संशोधन (श्री अनन्तसयनम् द्वारा) पेश किया गयाः

फ्कि विधेयक के खंड 2 के भाग (ग) में, ‘प्रान्त’ शब्द के पश्चात्, जहां कहीं वह आता है, ‘या कोई राज्य’ शब्द अंतः स्थापित किए जाएँ।य्

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः चूंकि मेरे मित्र श्री अनन्तसयनम् अय्यंगर द्वारा पेश किए गए संशोधन में एक विधि प्रश्न उठाया गया है, अतः यह उचित और ठीक होगा कि मैं स्वयं इस संशोधन से उत्पन्न प्रश्न का समाधान करूं। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि श्री अनन्तसयनम् अय्यंगर के संशोधन में निहित उद्देश्य बहुत ही प्रशंसनीय है। ऐसा विधेयक जो नर्सिंग वृत्ति से संबंधित है और जो उस वृत्ति को ऐसे आधार पर विनियमित और स्थापित करने का प्रयास करता है जिससे नर्सों की सेवा लेने वाले सभी व्यक्तियों का विश्वास प्राप्त हो और इसे संपूर्ण भारत में विस्तारित किया जाना चाहिए। मैं कहता हूँ, यह बहुत ही प्रशंसनीय कार्य है। किंतु दुर्भाग्यवश, हम जैसी स्थिति में हैं, और जिस प्रकार से हम यथा अनुकूलित भारत अधिनियम, 1935 द्वारा शासित हैं, मुझे डर है कि यह संभव नहीं हो सकेगा कि उनके संशोधन को स्वीकार किया जाए क्योंकि मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनके संशोधन से विधेयक विधानमंडल के लिए अधिकारातीत हो जाएगा। महोदय, अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए मैं सदन को यह बताना चाहूंगा कि इस समय रियासतें भारत संघ से दो भिन्न-भिन्न प्रकार से सम्बद्ध हैं। उनके सम्बद्ध होने का एक रूप ठहराव करार कहलाता है जो भारत संघ तथा विभिन्न देशी रियासतों के मध्य किया गया है। वह दूसरा सम्पर्क जिससे देशी रियासतें, भारत संघ से सम्बद्ध हैं, अंगीकार पत्र हैं। इन दोनों सम्बन्धों में एक बुनियादी अंतर है। स्टैंडस्टिल करार पूर्ण रूप से संविदात्मक होते हैं। वे उन करारों को परिरक्षित रखते हैं जो 15 अगस्त, 1947 के पूर्व पुरानी भारत सरकार और सर्वोपारिता के अधीन

ऽऽसं. स. (वि.) वा., खंड II, 9 दिसम्बर, 1947, पृष्ठ 1580-82