24. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 222

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परामर्श करना बेहतर होगा कि क्या यह निरर्हता उम्मीदवार के रूप में खड़े होने के लिए होनी चाहिए अथवा यह निरर्हता संसद-सदस्य के रूप में बने रहने तक सीमित कर देनी चाहिए। चूंकि मैं स्वयं आश्वस्त नहीं था कि कौन-सा रास्ता अपनाया जाए, मैंने यह मामला प्रवर समिति द्वारा निर्णीत किए जाने के लिए खुला छोड़ दिया है।

अब मैं दूसरे विषय अर्थात् चुनाव संचालन पर आता हूँ। इस संबंध में मैं सदन का ध्यान उन नई विशेषताओं की ओर आकर्षित करना चाहूँंगा जो नामांकन के संबंध में इस विधेयक में दी गई हैं। जैसा कि सदन को याद होगा कि वर्तमान कानून के अंतर्गत किसी उम्मीदवार के नामांकन की वैधता के प्रश्न पर किसी चुनाव अर्जी के आधार पर मत-याचना की जा सकती है, चर्चा की जा सकती है तथा निर्णय लिया जा सकता है। मैं हमेशा ही अनुभव करता रहा हूँ कि यह एक बहुत ही कड़ी प्रक्रिया है। कहने को तो नामांकन का सवाल बहुत ही प्राथमिक मुद्दा है और कोई कानून नहीं है कि इस प्राथमिक मुद्दे को लटकता हुआ छोड़ दिया जाए, और पूरे चुनाव को होने दिया जाए, लोगों को चुनाव लड़ने में अपना समय और अपनी ऊर्जा खर्च करने पर बाध्य किया जाए और उसके बाद कोई अचानक सामने आकर कहने लगे कि निर्वाचित उम्मीदवार का नामांकन वैध नहीं है। ताकि चुनाव के गुणावगुण में जाए बिना यह प्रक्रिया अपनाई जाए और पूरा मामला एक मुद्दे के आधार पर निपटा दिया जाए। मैं समझता हूँ कि चुनाव अर्जियों के मामले में इस प्राथमिक मुद्दे को अन्य मुद्दे से अलग करना वांछनीय होगा कि क्या चुनाव अन्य आधारों की दृष्टि से वैध है अथवा नहीं। अतः मैंने इस विधेयक में यह प्रस्ताव रखा है कि इस मुद्दो को प्राथमिक मुद्दा माना जाएगा तथा चुनाव आयुक्त कोई अधिकरण बनाने के लिए कोई उपबंध करेगा जिसे नामांकन की वैधता संबंधी किसी विवाद को सौंपा जाएगा और उसके द्वारा इसका अन्तिम निपटारा किया जाएगा ताकि जब चुनाव हों तो इस अधिकरण के समक्ष ऐसा कोई मुद्दा न उठाया जा सके। मुझे विश्वास है कि यह बहुत ही हितकारी उपबंध होगा। मुझे खेद है कि चुनाव आयुक्त की सलाह के आधार पर पहले चुनाव के अवसर पर इस उपबंध को लागू करना संभव नहीं होगा क्योंकि उनका विचार है कि उन्हें तदर्थ अधिकरण बनाने के लिए विचार करने हेतु पर्याप्त समय नहीं मिला है जो चुनाव लड़ने वालों को राहत पहुँचा सके। किन्तु जैसा कि मैंने कहा यदि प्रवर समिति यह मानती है कि इसका भी अनुप्रयोग करना चाहिए तब मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी।

चुनाव संचालन के अन्तर्गत मैं दूसरे महत्वपूर्ण विषय अर्थात् मतदान के तरीके की ओर भी ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा। इस विधेयक में व्यवस्था है कि कुछ निर्वाचन-क्षेत्र दो सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र होंगे। यह इस तथ्य के चलते अपरिहार्य है कि संविधान में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था है। इस तथ्य से कि आपके पास आरक्षित निर्वाचन-क्षेत्र हैं, अभिप्रेत है कम से कम दो सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र।