24. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 223

208 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पंडित ठाकुर दास भार्गव (पंजाब)ः क्यों, यह अपरिहार्य नहीं है।

डॉ. अम्बेडकरः इस विषय पर आप चर्चा कर सकते हैं परंतु देखना है कि यह विधेयक आगे कैसे बढ़ता है। अतः कुछ दो सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र होंगे। अन्य निर्वाचन-क्षेत्र एक सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र होंगे। दो सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्रों में मतदान विभाजक मत के आधार पर होगा।

अब मैं निर्वाचन अधिकरण पर आता हूँ।

पण्डित मित्राः क्या मैं जान सकता हूँ कि तीन सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र किसी भी स्थिति में नहीं होंगे।

डॉ. अम्बेडकरः अन्त में मैं यही कहना चाहूँगा कि ये ऐसे विषय नहीं हैं जिन्हें अन्तिम मान लिया जाए।

निर्वाचन अधिकरण के संबंध में यही स्थिति है और भी अनेक तरीकों से निर्वाचन अधिकरण का गठन किया जा सकता है। या तो आप ऐसा निर्वाचन अधिकरण का गठन कर सकते हैं जिसका प्राधिकार अन्तिम होगा, और अपील का अधिकार नहीं होगा या आप ऐसा निर्वाचन अधिकरण भी गठित कर सकते हैं जिसके निर्णय के विरुद्ध अपील की जा सके। जैसा कि मैंने कहा था, इसको लेकर कोई सिद्धांत नहीं बन सकता। यह सब कुछ जनमत के आलोक में तय करना होगा। लेकिन यह विधेयक इस अनुमान के आधार पर आगे बढ़ रहा है कि उच्च न्यायालय में अपील का अधिकार होगा। यह माना जाता है कि निर्वाचन विवादों के निपटारे के लिए जनता का सरकारी मशीनरी में ज्यादा विश्वास होता है। कहा जाता है कि गैर-सरकारी व्यवस्था पूर्वाग्रही हो सकती है जो किसी चुनावी विवाद के मामले में अन्तिम निर्णय पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है। परिण् ामस्वरूप, इस विधेयक में दो सदस्यीय अधिकरण का प्रस्ताव है। इसका चैयरमैन (अध्यक्ष) जिला-न्यायाधीश नहीं हो सकता। वह कोई अन्य न्यायिक अधिकारी हो सकता है परंतु होगा अधिकारी ही। सवाल यह है कि इस समय यह कल्पना करना मुश्किल है कि चुनाव अर्जियों की संख्या कम होगी। जहाँ तक मैं समझता हूँ कि इस देश के लोग राजनीति के प्रति अत्यधिक मंत्रमुग्ध हैंµराजनीति के प्रति उनमें लगभग सनक-सी हैµमेरा अनुमान है कि चुनाव अर्जियों की संख्या बहुत अधिक हो सकती है। यदि ऐसा होता है और आप चाहते हैं कि अपीलों पर निर्णय करने वाली मशीनरी सरकारी हो, तो जिला-न्यायाधीशों की संख्या जो आज उपलब्ध हो सकते हैं, इस कार्य को पूरा करने के लिए निश्चित रूप से अपर्याप्त होगी। यही कारण है कि दूसरे सदस्य को न्यायिक अधिकारी कहा गया है। वह जिला-न्यायाधीश के दर्जे का नहीं हो सकता। इसके अलावा यह व्यवस्था की गई है कि विभिन्न प्रान्तों के उच्च न्यायालय ऐसे वकीलों (अधिवक्ताओं) की सूची तैयार करें जो उच्च न्यायालय के मतानुसार पर्याप्त रूप से अर्हक एवं विश्वसनीय माने जाएं