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श्री त्यागीः डॉ. अम्बेडकर मुझसे आशा करते हैं कि मैं इस बात पर विश्वास करूँ कि संस्थान द्वारा प्रदान की जाने वाली डिग्रियों को तो मान्यता प्रदान की जाए, भले ही संस्थान को स्वयं मान्यता प्राप्त न हो। अमुक-अमुक वर्ष में प्रदान की गई कलकत्ता विश्वविद्यालय की डिग्रियों को भारतीय सिविल सेवा अथवा भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए मान्यता दी जा सकती है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि कलकत्ता विश्वविद्यालय मान्यता प्राप्त है। क्या तर्क है। यहाँ मैं उन्हें अधिक शक्तियां दे रहा हूँ। मैं यह सुझाव दे रहा हूँ कि वे उस संस्थान को मान्यता भी प्रदान कर सकते हैं। मैं चाहता हूँ सरकार के पास ऐसी शक्तियां हों कि वह किसी भी संस्थान को मान्यता प्रदान कर सके............।
डॉ. अम्बेडकरः वह शक्ति धारा 10(2) में विद्यमान है।
श्री त्यागीः महोदय, मैं कोई संशोधन नहीं रख रहा हूँ।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः मैं प्रस्ताव रखने की अनुमति चाहूँगाः
फ्दंत चिकित्स अधिनियम, 1948 की अनुसूची के भाग- I की प्रस्तावित मद (2क) में, खंड 4 में फ्मार्च, 1940य् के बाद आने वाले सभी शब्दों को हटा दिया जाए।य्
अतः, जब आपने सभी अन्य को प्रैक्टिस के आधार पर दंत चिकित्सकों के रूप में मान्यता दे दी है तब प्रैक्टिस का यह सिद्धांत इन आठ या दस आदमियों के मामले में भी लागू होना चाहिए। अतः, मैं निवेदन करूंगा कि इस संशोधन को स्वीकार कर लिया जाए।
माननीय उपाध्यक्षः क्या मैं इस संशोधन के प्रति माननीय मंत्री की प्रतिक्रिया जान सकता हूँ?
डॉ. अम्बेडकरः यही खंड ऐसा खंड है जो वास्तविक रूप से पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दिए गए सुझाव को कार्यान्वित करता है। व्यक्तिगत तौर पर मैं स्वयं यह महसूस करता हूँ, तथापि मेरी अधिक सहानुभूति मेरे मित्र श्री भार्गव के साथ होगी, इसमें एक दंत चिकित्सक की अर्हता के मूल्यांकन का प्रश्न शामिल है जो एक ऐसे व्यक्ति से जो नकली दांत बनाता है, भिन्न है। मैंने यह सोचा कि वे नकली दांत बनाने वाले व्यक्ति के प्रति काफी वाकपुट हैं। ऐसा व्यक्ति जो नकली दांत बनाता है, जरूरी नहीं कि वह दंत चिकित्सक भी हो। हम दंत चिकित्सक की बात कर रहे हैं जो एकदम अलग व्यवसाय है।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः किन्तु उनके पास एल.डी.एससी. की डिग्री है।
डॉ. अम्बेडकरः मुद्दा यह है कि जब यह अधिनियम पारित किया गया था, तब इस संस्थान को मान्यता प्रदान करने योग्य नहीं समझा गया था। तदुपरांत इस संबंध में