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ऽसिविल प्रक्रिया संहिता (संशोधन) विधेयक
विधि मंत्री (डॉ. अम्बेडकर)ः मैं प्रस्ताव रखने की अनुमति चाहता हूँः
फ्कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के संशोधन के लिए विधेयक पर विचार किया जाए।य्
इस विधेयक के उद्देश्य तिहरा है। पहला उद्देश्य यह है कि इस सिविल प्रक्रिया संहिता को इस विधेयक के खंड 2 में विनिर्दिष्ट कुछ क्षेत्रों को छोड़कर पूरे भारत पर लागू किया जाए। जैसा कि सदन को मालूम होगा, यह सिविल प्रक्रिया संहिता भाग ‘क’ राज्यों पर लागू होती है, यह भाग ‘ख’ राज्यों पर लागू नहीं होती। प्रत्येक भाग ‘ख’ राज्यों की अपनी-अपनी सिविल प्रक्रिया संहिता है और वह कमोवेश वैसी ही है जैसी कि भाग ‘क’ राज्यों पर लागू है फिर भी इसका अधिकार-क्षेत्र पृथक है। इसका परिणाम यह हुआ है कि भाग ‘ख’ राज्यों के न्यायालयों की अधिकारिता में आने वाले क्षेत्रों के बारे में भाग ‘क’ राज्यों के न्यायालयों द्वारा पारित डिग्रियों के निष्पादन और सम्मनों को तामील करने में अत्यधिक कठिनाई होती है। चूंकि हमारे संविधान के उपबंधों के अधान भारत एकीकृत हो चुका है, अतः वादों एवं प्रक्रियाओं तथा डिग्रियों के निष्पादन के मामले में सिविल अधिकारिता निर्धारित करने के दृष्टिकोण से यह वांछनीय है कि एकल सिविल प्रक्रिया संहिता हो। यह उद्देश्य खंड 2 से पूरा हो जाता है।
इस विधेयक का दूसरा उद्देश्य यह है कि कुछ ऐसे मामले हैं जो वर्तमान सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत नहीं आते जैसे यह भाग ‘क’ राज्यों पर लागू होती है। उदाहरण के लिए, विदेशी न्यायालयों से प्राप्त विदेशी सम्मनों को तामील करने का कोई उपबंध नहीं है। इस प्रकार, जिन स्थानों पर यह संहिता लागू नहीं होती, उन स्थानों में सिविल न्यायालयों द्वारा पारित डिग्रियों के निष्पादन के लिए कोई उपबंध नहीं है। ठीक इसी तरह, ऐसे स्थानों पर, जहां यह संहिता लागू नहीं होती, राजस्व न्यायालयों द्वारा पारित डिग्री के निष्पादन का माला भी सम्मिलित नहीं है। इसी तरह हमारी वर्तमान सिविल प्रक्रिया संहिता में विदेशी न्यायालयों द्वारा जारी कमीशन के कार्यान्वयन का उपबंध भी नहीं दिया गया है। इन मामलों के लिए व्यवस्था करने हेतु इन्हें इस संशोधन विधेयक के खंड 6, 8, 9 तथा 11 में रखा गया है जो उनसे संबंधित हैं। ये स्वयं इतने स्वतः स्पष्ट हैं कि मैं नहीं समझता कि इन नए खंडों के उद्देश्य को समझने के लिए माननीय सदस्यों को मेरी कोई टिप्पणी आवश्यक है।
सबसे महत्वपूर्ण खंड निस्संदेह खंड 12 है और यह इसी से संबंधित है और इस
ऽसं. वा., खंड 8, भाग II, 9 फरवरी, 1950, पृष्ठ 2627-32