226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बारे में मैं अपनी कुछ टिप्पणी देना चाहता हूँ। जैसा कि देखेंगे, खंड 12 धारा 83, 85, 86, 87 तथा 87-ख को प्रतिस्थापित करता है। ये धाराएं विदेशियों द्वारा, विदेशी शासकों, राजदूतों तथा दूतों द्वारा या उनके विरुद्ध दावों से संबंधित हैं। अब केवल 86 तथा 87-ख धाराओं में ही परिवर्तन किए गए हैं। जहां तक धारा 86 का सवाल है, यह वास्तव में पुरानी धारा 86 है जिसमें कुछ मामूली परिवर्तन किया गया है। धारा 86 में जिस परिवर्तन का प्रस्ताव किया गया है, वह उप-खंड (2)(घ) में है। यह विदेशी शासकों को दिए गए विशेषाधिकार का अधित्याग करने से संबंधित है, अर्थात् उन पर वाद कुछ विशेष स्थितियों में ही तथा कुछ विशेष प्रक्रियागत नियमों को पूरा करने पर चलाया जाएगा। जो प्रश्न उठाया गया है, वह यह है कि क्या धारा 86 के उपबंधों के अधीन आने वाला कोई ऐसा व्यक्ति ऐसे विशेषाधिकार का अधित्याग कर सकता है और क्या इस तथ्य के बावजूद कि वह ऐसे विशेषाधिकार का अधित्याग करने को तैयार है, फिर भी इस सांविधिक उपबंध को परिशीलन किया जाना चाहिए। भारत में कुछ न्यायालयों ने इसे सही ठहराया है कि चूंंकि यह प्रक्रियागत प्रकृति का सांविधिक विशेषाधिकार है, ऐसे विशेषाधिकार-प्राप्त व्यक्ति को यह स्वतन्त्रता नहीं है कि वह इसका अधित्याजन कर दे और यह कि जो व्यक्ति वाद चलाना चाहता है, उसे विशेष प्रक्रिया अपनानी होगी। अब यह ज्यादा उपयुक्त या सही प्रतीत नहीं होता कि जिस व्यक्ति को विशेषाधिकार दिया गया है और वह चाहता है कि उसे उस विशेषाधिकार की आवश्यकता नहीं है या वह उसका लाभ नहीं उठाना चाहता है तो उसे उस विशेषाधिकार का लाभ उठाने से रोक देना चाहिए। अतः इस मामले को सुलझाने के लिए इस उपबंध को लाया गया है जो स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि कोई व्यक्ति जिसे यह विशेषाधिकार दिया गया है और वह चाहता है कि इस विशेषाधिकार का अधित्याजन कर दिया जाए, तो वह ऐसा कर सकता है।
धारा 86 के दूसरे खंड जिसमें कुछ परिवर्तन किया गया है और जिसकी ओर मैं सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ, उप-खंड (4)(ख) है। हमने विशेषाधिकार प्राप्त लोगों की पुरानी श्रेणियों में एक और श्रेणी को जोड़ा है, अर्थात् यह श्रेणी भारत में रहने वाले उच्चायुक्त की श्रेणी है। अब तक उच्चायुक्त की स्थिति कुछ-कुछ असंगत प्रकृति की थी। क्या वह राजदूत है? वह क्या है? वह किसका प्रतिनिधि है? क्या उसके पास वही विशेषाधिकार हैं जो विदेशी शासक के प्रतिनिधि के पास होते हैं? अतः एक बार फिर इस संदिग्धता को दूर करने के प्रयोजन से यह अनुभव किया गया है कि राजदूत को विशेषाधिकार प्राप्त लोगों की श्रेणी में शामिल करना वांछनीय होगा। उदाहरण के लिए, हमारे राज्य-क्षेत्र में राष्ट्रमंडल के प्रतिनिधि हैं जिन्हें उच्चायुक्त कहा जाता है और जिन्हें कूटनीतिक दृष्टिकोण से वही हैसियत प्राप्त है जो राजदूतों की होती है, फलस्वरूप, उनके पदनाम में अंतर करने का कोई भी कारण हो सकता, वास्तव में, वे अपनी-अपनी सरकारों के प्रमुखों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अतः यह उपयुक्त होगा कि उन्हें वही सम्मान मिलना चाहिए, जो किसी राजदूत को मिलता है।