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पुरानी धारा 86 में परिवर्तन करने वाला दूसरा खंड 86, उप-खंड (4), उप-खंड (ग) है। यह कहता है कि विदेशी सरकारों के प्रमुख या उनके राजदूतों तथा उच्चायुक्तों को प्रदान किए गए विशेषाधिकार उनके परिजनों तथा उनके स्टाफ के ऐसे सदस्यों को भी दिए जाएँ जिन्हें भारत सरकार द्वारा जन-साधारण की सूचना के लिए अधिसूचित किया गया हो। अन्तरराष्ट्रीय कानून की दृष्टि से, यहां एक बार फिर कोई एकरूपता प्रतीत नहीं होती। अन्तरराष्ट्रीय वकीलों के एक समूह ने यह माना है कि जब कभी आप किसी राजदूत को किसी विदेशी राज्य के प्रतिनिधि के तौर पर उन्मुक्तता या विशेषाधिकार प्रदान कर देते हैं और ऐसा आप इस आधार पर करते हैं कि उसकी छोटी-सी कालोनी यहां पर लगभग उसके देश का ही प्रतिनिधित्व करती है, कानूनी दृष्टि से देखें, तो स्वयं उस व्यक्ति तथा उन एजेंटों जिनके माध्यम से वह इस देश में कार्यशील है, के बीच अन्तर करने का कोई आधार नहीं है। ऐसे भी अन्तरराष्ट्रीय वकील हैं जिन्होंने कहा है कि ये विशेषाधिकार हरेक को नहीं दिए जाने चाहिए लेकिन राज्य इस मामले में स्वतंत्र है कि वह किसे यह विशेषाधिकार दे और किसे नहीं दे। चूंकि अन्तरराष्ट्रीय कानून की दृष्टि से यह मामला अभी तय नहीं हुआ है, अतः यह अनुभव किया गया है कि कानून के लिए सबसे बढि़या रास्ता यही होगा कि केन्द्रीय सरकार को यह शक्ति दे दी जाए कि वह यह अधिसूचित करे कि वह यह विशेषाधिकार किसको देना चाहेगी। इस खंड के अन्तर्गत भारत सरकार के विदेशी मामलों के विभाग के लिए यह संभव हो जाएगा कि वह इस बात का पता लगाए कि दूसरे देशों में क्या स्थिति है तथा इस देश में बृहत्तर राजनीतिक राय के मुताबिक उपयुक्त अधिसूचना जारी करे। हमने सिविल प्रक्रिया संहिता की पुरानी धारा 86 में यही परिवर्तन करने का प्रस्ताव रखा है।
12.00 बजे दोपहर
अब मैं धारा 87-ख पर आता हूँ जिसमें मैं समझता हूँ अधिकांश सदस्य गहरी रुचि रखते हैं। धारा 87 पूर्ववर्ती देशी रियासतों के शासकों से संबंधित है। प्रश्न है कि क्या उन्हें भी कोई ऐसे विशेषाधिकार मिलने चाहिएं जो उन्हें वर्तमान सिविल प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत प्राप्त थे। स्पष्टतः चूंकि अब वे राजनीतिक एवं विधिक शब्दावली में शासक नहीं रहे हैं, अतः वे निस्सन्देह उस कानून के लागू होने से किसी प्रकार की उन्मुक्ति का दावा नहीं कर सकते जो कानून इस देश के अन्य शेष नागरिकों पर लागू है। लेकिन सदन को ज्ञात होगा कि भारत सरकार, यदि मैं ऐसा कहूं, तो संविधान सभा दोनों ने ही जब संविधान उनके सामने था, कुछ वायदे किए हैं और यह आवश्यक है कि हम उसे मान्यता प्रदान करें जिसे हम पहले ही कर चुके हैं। अतः अब इस नई धारा के द्वारा जो कुछ भी किए जाने का प्रस्ताव है, वह यह है कि धारा 85 तथा धारा 86 की उप-धारा (1) तथा (3) पूर्ववर्ती देशी रियासतों के शासकों को लागू हों। यदि माननीय सदस्य धारा 85 को देखें जैसा कि इस संशोधन विधेयक में दी गई है, उन्हें पता चल