27. सिविल प्रक्रिया संहिता (संशोधन) विधेयक - Page 243

228 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जाएगा कि यह केवल यह कहती है कि यदि कोई विदेशी शासक वाद चलाना चाहता है या उस पर वाद चलाया जा रहा है तो उसे किसी विशेष व्यक्ति को नियुक्त करने की अनुमति दी जा सकती है, और भारत सरकार उसे ऐसा करने की अनुमति दे सकती है ताकि वादी अथवा प्रतिवादी के रूप में उसकी ओर से मुकदमा लड़ा जा सके। इसका विस्तार करने में कोई बुराई नहीं है। पूर्व देशी रियासत के शासक को धारा 85 के अन्तर्गत केवल एक विशेषाधिकार प्राप्त है कि जब उसके खिलाफ कोई वाद चल रहा हो तो उसे व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित रहने की आवश्यकता नहीं है। वह परोक्षी द्वारा प्रतिवाद कर सकता है।

धारा 86 (1) का कहना है कि यदि किसी पूर्व देशी रियासत के शासक के विरुद्ध सिविल प्रकृति की कोई कार्यवाही आरम्भ की जाती है तो इसके लिए पहले भारत सरकार की सहमति लेना आवश्यक होगा। मैं समझता हूं कि कल जब हम दण्ड प्रक्रिया संहिता का संशोधन करने के लिए इस विधेयक पर चर्चा कर रहे थे, तब इस मामले में एक बार फिर अच्छी तरह विचार किया गया था। मुद्दा यह था कि वर्तमान परिस्थितियों में यह विश्वास करने के कारण हैं कि देशी रियासतों में निवास करने वाले व्यक्तियों के पास किसी राजकुमार के विरुद्ध अपनी दुश्मनी निभाने या व्यक्तिगत विद्वेष के चलते शिकायत करने के अनेक आधार या कारण हो सकते हैं और वे उसे बिना किसी वास्तविक कारण के किसी न्यायालय में घसीट सकते हैं और परेशान कर सकते हैं। भारत सरकार से सहमति प्राप्त करने का उद्देश्य यह नहीं है कि भारत सरकार के पास उस राजकुमार को किसी ऐसे मुकदमे से बचाने की असीम शक्ति है जिस मुकदमे में उसे प्रतिद्विन्द्वयों के पास उसके विरुद्ध किया गया दावा सद्भाविक स्वरूप का है। इस सम्मति को अपेक्षित करने में इसके परे कोई प्रयोजन नहीं है।

उप-खंड (3) उसे गिरफतार न करने तथा उसकी सम्पत्ति के विरुद्ध पारित किसी डिक्री के केन्द्रीय सरकार की सम्मति के बिना निष्पादन की स्वतंत्रता देता है जैसा मैंने कहा है, यह केवल, मुझे कहना चाहिए, कुछ वायदों को पूरा करना है जो हमने भारतीय शासकों की मर्यादा को बनाए रखने के लिए किए हैं। इसके अलावा कुछ भी नहीं।

मैं धारा 87 (ख) (2) (ख) में दिए गए ‘शासक’ शब्द की परिभाषा की ओर भी सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। मेरे विचार से यह परिभाषा महत्वपूर्ण है। ऐसा नहीं है कि धारा 87-ख में दिए गए उपबंधों का लाभ पूर्व देशी रियासतों के प्रत्येक शासक को मिलेगा। यह परिभाषा कुछ सीमित है, अर्थात् उस शासक को राष्ट्रपति द्वारा मान्यता मिली कि वह इन विशेषाधिकारों का हकदार है। यदि किसी राजकुमार का व्यवहार इस प्रकार का है कि राष्ट्रपति समझते हैं कि उसे मान्यता नहीं मिलनी चाहिए, तो राष्ट्रपति का व्यवहार इस प्रकार है कि राष्ट्रपति समझते हैं कि उसे मान्यता नहीं मिलनी चाहिए, तो राष्ट्रपति के लिए यह पूरी तरह संभव होगा कि वे उसका नाम किसी