230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अपनाई है। अतः वर्तमान सिविल प्रक्रिया संहिता में अपनाई गई भाषा में कोई विचलन नहीं है। लेकिन इस संबंध में मैं उनका ध्यान उस परिभाषा की ओर आकर्षित करना चाहूंगा जो हमने ‘शासक’ के बारे में दी है और जो इस विधेयक की प्रस्तावित धारा 87-क में दी गई है। वह इस प्रकार हैः
फ्किसी विदेशी राज्य के संबंध में ‘शासक’ से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे कुछ समय के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा उस राज्य के प्रमुख के रूप में मान्यता दी गई हो।य्
अतः, क्या किसी राज्य विशेष की सरकार राजतंत्रीय व्यवस्था वाली है और शासक राजा है या किसी राज्य विशेष की गणतंत्र सरकार है और उसका प्रधान राष्ट्रपति या कोई अन्य गणमान्य व्यक्ति है, इस बारे में इस तथ्य के मद्देनजर कोई कठिनाई नहीं हो सकती क्योंकि हमारी परिभाषा इस मामले को केन्द्रीय सरकार पर छोड़ती है कि वह बताए कि इस राज्य के प्रभुत्व के तौर पर किसे मान्यता दी जाए।
देशी शासकों की स्थिति के बारे में मुझसे कहा गया है कि मैं एक या दो बातें स्पष्ट करूं। पहली यह है कि ये विशेषाधिकार कब तक रहेंगे और दूसरी, क्या ये विशेषाधिकार वर्तमान शासकों के व्यक्तिगत विशेषाधिकार हैं अथवा क्या उनकी प्रकृति पैतृक है जो पिता के बाद पुत्र को मिल जाएंगे। मेरे वकील मित्र यह मानेंगे कि कोई वकील तब तक किसी समस्या को सुलझाने का जिम्मा नहीं लेता जब तक कि वह समस्या उसके सामने प्रस्तुत नहीं होती। ऐसी कोई समस्या मेरे सामने नहीं है और इस प्रकार मैं न तो कोई खास निर्वचन देने की स्थिति में हूँ और न ही मैं ऐसा करने का वायदा करना चाहता हूँ।
माननीय उपाध्यक्षः यह है! तत्समय शासक।
डॉ. अम्बेडकरः हाँ, तत्समय। अतः मैं यह कर रहा हूँ कि यह मामला ऐसा है जिस पर कभी भी विचार किया जा सकता है और कभी भी पुनरीक्षण किया जा सकता है। यह ऐसा मामला नहीं है जिसे संसद या सरकार के कार्यक्षेत्र से बाहर कर दिया गया हो। यदि संसद ऐसा चाहे तो वह निर्णय कर सकती है कि ये विशेषाधिकार एवं उन्मंक्तियाँ समाप्त कर दी जाएं, क्योंकि हमें यह विचार करने के लिए पर्याप्त समय मिल गया है कि भारतीय राजकुमारों के ये दुश्मन अब नहीं रहे हैं या गायब हो गए हैं और उन्हें परेशान करने के लिए कोई सन्तति नहीं छोड़ गए हैं या वे यह निर्णय भी ले सकते हैं कि इन विशेषाधिकार को इनके धारकों के जीवनपर्यन्त बने रहने दिया जाए। इस प्रकार यह मुद्दा पूरी तरह खुला है, बन्द नहीं है।
सम्मति देने या न देने की शक्ति का सरकार द्वारा कब तक उपयोग किया जाएगा, इसके संबंध में सरकार की ओर से मांगे गए आश्वासनों के संबंध में मैं स्वयं यह कहना चाहूँगा कि मेरे दिमाग में तनिक भी सन्देह नहीं है कि इस मामले को निपटाने वाली कोई सरकार या सरकार का कोई सदस्य किसी ऐसे मामले में सहमति देने के विषय