232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(उपाध्यक्ष पीठासीन)
खंड 2 तथा 3
विधेयक में खंड 2 तथा 3 जोड़े गए।
खंड 4 से 11
श्री राजबहादुर (राजस्थान)ः मैं खंड 4 में संशोधन चाहता हूँ परंतु मैं औपचारिक रूप से इसका प्रस्ताव नहीं रखना चाहता। मैं केवल एक बात कहना चाहता हूँ। संविधान में कहीं पर भी केन्द्रीय सरकार को इस प्रकार न्यायालय गठित करने के लिए प्राधिकृत नहीं किया गया है। इस मामले में जो कुछ भी प्राधिकार दिया गया है, उसका उपयोग उच्चतम न्यायालय के बारे में राष्ट्रपति द्वारा एवं राज्यों के न्यायालयों के बारे में उस राज्य विशेष के राज्यपाल द्वारा किया जाता है। मेरी आपत्ति इसी मामले में है। मैं समझता हूँ कि यदि हम ‘केन्द्रीय सरकार’ शब्दों के स्थान पर ‘संविधान के प्राधिकार के अंतर्गत’ शब्द प्रतिस्थापित कर दें तो यह ज्यादा बेहतर रहेगा।
डॉ. अम्बेडकरः मैं यह सुझाव स्वीकार नहीं कर सकता। संविधान ने कुछ न्यायालयों - उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की स्थापना की है। जहां तक विशेष न्यायालयों के गठन का प्रश्न है, यह शक्ति संसद को दी गई है और केन्द्रीय सरकार संसद द्वारा दिए गए इस प्राधिकार के अंतर्गत कार्य कर सकती है। अतः ‘भारत का संविधान’ शब्दों का उपयोग करना अनुपयुक्त है। इसके अतिरिक्त, सभी अनुकूलन आदेशों में ‘केन्द्रीय सरकार’ का ही उपयोग किया गया है और मेरे विचार में यदि इस विधेयक विशेष में शब्दावली के विषय में विचलन किया गया तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा।
माननीय उपाध्यक्षः इस प्रकार अब माननीय सदस्य की बात का जबाव मिल गया है। मैं खंड 4 से 11 को एक साथ रखूंगा क्योंकि उनमें कोई संशोधन नहीं है।
प्रश्न हैः
फ्कि खंड 4 से 11 इस विधेयक के अंग हो गए हैं।य्
प्रस्ताव अंगीकार किया गया।
खंड 4 से 11 इस विधेयक में जोड़े गये।
माननीय उपाध्यक्षः विषयक सूचना के मुद्दे पर खंड 9 के बारे में क्या मैं माननीय मंत्री जी से जान सकता हूँ कि ‘किसी अन्य राज्य की किसी रियासत में किसी राजस्व न्यायालय की डिक्री का निष्पादन’ कहने की क्या आवश्यकता है। क्या ‘उस राज्य में राजस्व न्यायालय’ नहीं हो सकता? इसे बढ़ाया क्यों जाना चाहिए?
डॉ. अम्बेडकरः इसे बृहतर शब्दों में रखने का उद्देश्य इसे सुगम बनाना है।