27. सिविल प्रक्रिया संहिता (संशोधन) विधेयक - Page 248

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डॉ. आर.यू. सिंहः जब इस विधेयक पर विचार करते समय सामान्य चर्चा हो रही थी, तब मैंने यही मुद्दा उठाया था और माननीय विधि मंत्री ने बताया था कि ‘शासक’ शब्द चर्चाधीन सिविल प्रक्रिया संहित की कुछ धाराओं में प्रयुक्त हुआ है। मैंने इस संशोधन विधेयक के खंड 12 के अन्तर्गत चर्चाधीन इस सिविल प्रक्रिया संहिता की अनेक धाराओं को देखा है और मैं यह दावे के साथ कहता हूँ कि ‘शासक’ शब्द कहीं अन्यत्र प्रयुक्त नहीं हुआ है। जैसा कि मैंने पहले कहा था केवल उप-शीर्षक में ही ‘विदेशी शासकों’ शब्द का प्रयोग किया गया है। स्वयं इन धाराओं में ‘शासक’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। ‘शासन प्रमुख’ का प्रयोग किया जा सकता था क्योंकि यह शब्द इस देश में चलता था। ऐसे ही कुछ अन्य शब्दों का प्रयोग किया जा सकता था किन्तु महोदय, मैं चुनौती देता हूँ कि ‘शासक’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।

जहां तक इस सिविल प्रक्रिया संहिता के उपबंधों का प्रश्न है, ‘शासक’ शब्द को परिभाषित करना आवश्यक नहीं है। मेरे द्वारा उठाया गया मुद्दा यह था कि ऐसा अनावश्यक रूप से किया गया है और मैं यह कहकर उस तर्क पर पुनः जोर देता हूँ कि जब हम अन्तरराष्ट्रीय कानून के प्रश्नों पर बातचीत कर रहे हैं तब हमें ऐसी शब्दावली का प्रयोग करना होगा जो अन्तरराष्ट्रीय कानून की शब्दावली हो। मैं देखता हूँ कि ‘शासक’ शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। सामान्यतया जिन शब्दों का प्रयोग हुआ है वे हैं ‘कोई प्रमुख’ या ‘संप्रभु’ ‘विदेशी राज्य’ या ‘विदेशी प्रभुसत्ता’। मैं भी सोचता हूँ कि सरकार ने ‘शासक’ शब्द की शुरूआत करने में अनावश्यक कष्ट उठाया है। मैं अनुभव करता हूँ कि क्या केवल ‘प्रमुख’ शब्द को ही अब प्रतिस्थापित कर दिया जाए, क्योंकि उन्होंने इस धारा को पुनः व्यवस्थित किया है और इस चीज को इस प्रकार तैयार किया है कि कुछ खंड बेढंगे हो जाएंगे। कुछ स्थानों पर ‘राज्य प्रमुख’ इस्तेमाल करना पड़ेगा और कुछ स्थानों पर केवल ‘प्रमुख’ इस्तेमाल करना पड़ेगा और कुछ स्थानों पर केवल ‘प्रमुख’ से ही काम चल जाएगा। इसलिए अपने मूल दृष्टिकोण पर अडिग रहते हुए मैं यह समझता हूँ कि ‘शासक’ शब्द का प्रयोग अनुचित ढंग से किया गया है। मैं समझता हूँ कि इस संशोधन विधेयक में प्रयुक्त इस भद्दी पदावली को बना रहने दिया जाए या यदि उसे बना न रहने दिया जाए, तब कुछ स्थानों पर ‘प्रमुख’ शब्द इस्तेमाल करना पड़ेगा और दूसरे स्थान पर ‘विदेशी राज्य प्रमुख’ इस्तेमाल करना पड़ेगा क्योंकि प्रारूपकार ने इन खंडों को इस प्रकार व्यवस्थित किया है कि इस स्थिति में बचा नहीं जा सकता।

डॉ. अम्बेडकरः मैं वास्तव में नहीं समझ पा रहा हूँ कि मेरे माननीय मित्र इस विधेयक में प्रयुक्त पदावली पर नाखुश क्यों हैं। मेरे माननीय मित्र श्री राजबहादुर कहते हैं कि विदेशी शासकों एवं भारतीय शासकों के बीच उन्हें अलग-अलग नाम देकर अन्तर स्थापित करना बेहतर रहेगा। माना यही सही है तब क्या ‘राज्य प्रमुख’ को परिभाषित करना आवश्यक नहीं होगा।