27. सिविल प्रक्रिया संहिता (संशोधन) विधेयक - Page 249

234 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री राज बहादुरः नहीं, नहीं.........।

डॉ. अम्बेडकरः संयुक्त राज्य अमरीका में राष्ट्रपति हैं, ग्रेट ब्रिटेन में राजा है_ स्विटजरलैण्ड में राज्य का प्रतिनिधित्व कोई और मशीनरी करती है। यह ये तथ्य अलग-अलग हैं, तब आपको ‘राज्य प्रमुख’ की परिभाषा देनी होगी।

दूसरे माननीय सदस्य का कहना है कि उन्होंने इस सिविल प्रक्रिया संहिता के उन उपबंधों की जांच कर ली है जिनका उल्लेख मैंने सुबह किया था। उनका मानना है कि इस संशोधन विधेयक में जिन शब्दों का प्रयोग हमने किया है, वे शब्द इसमें नहीं हैं। मैं समझता हूँ, इस सिविल प्रक्रिया संहिता की प्रति उनके सामने रखी है।

डॉ. आर.यू. सिंहः यह मेरे पास है।

डॉ. अम्बेडकरः कृपया धारा 83 के शीर्षक को देखिए।

डॉ. आर.यू. सिंहः इस बारे में मैंने पहले ही कहा था।

डॉ. अम्बेडकरः शीर्षक है ‘विदेशियों तथा विदेशी शासकों और देशी रियासतों के शासकों द्वारा या उनके विरुद्ध वाद। मैं उनका ध्यान इस तथ्य की ओर भी आकर्षित करना चाहूँगा कि यह संशोधन भारतीय विधि आदेश के अनुकूलन द्वारा 1937 में किया गया था। मैं यह नहीं कह सकता कि मैं अन्तरराष्ट्रीय कानून तथा उस पदावली के बारे में जो वे प्रयोग करते हैं, पूरी तरह अद्यतन हूँ। लेकिन यह मैं पूरे विश्वास एवं संतोष के साथ कहता हूँ कि जिस किसी ने भी यह अनुकूलन कियाµवह मुझे यह कहने की इजाजत देंगे कि यह अनुकूलन भारतीय कार्यालय द्वारा किया गया था और किसी संसदीय वकील द्वारा सलाह दी गई होगी, जिसने ‘विदेशी शासकों’ पदावली का प्रयोग करके कोई गलती नहीं की होगी।

इसके बाद वह कहते हैं कि ‘किसी देशी रियासत के शासक’ शब्द का प्रयोग धारा 83 के आगे कभी नहीं किया गया है। मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि अनेक पदनामों का उपयोग किया गया है। देशी शासकों को राजकुमार, शासक, प्रधान तथा इसी तरह आगे कहा गया है। लेकिन मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ कि जब संविधान ने अनेक अनुच्छेदों के माध्यम से उन्हें विशेष प्रकार दिया है जैसेµ‘देशी रियासतों के शासक’ क्या प्रारूपकार को यह अनुज्ञा दी जा सकती है कि वह संविधान में प्रयुक्त भाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा का प्रयोग करें? ‘पूर्व देशी रियासतों के शासक’ शब्दों के प्रयोग का औचित्य सीधे तौर पर यह है कि यही वह भाषा है जिसका प्रयोग संविधान में किया गया है। हम नहीं चाहते कि संविधान में प्रयुक्त इस भाषा में विचलन किया जाए जिससे मेने माननीय मित्र श्री नजीरूद्दीन अहमद जैसे किसी भी व्यक्ति के लिए यह आसान हो जाए कि वह आकर कहे कि ‘ठीक है, यह उपबंध उन लोगों पर लागू नहीं होता जिन पर लागू होने के लिए इसे बनाया गया है।य्