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माननीय अध्यक्षः प्रश्न है
खंड 12 में फ्सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की प्रस्तावित नई धारा के परन्तु के ‘शासक’ को ‘प्रधान’ से प्रतिस्थापित किया जाए।य्
प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया गया।
इसी प्रकार 3 अन्य प्रस्ताव अस्वीकार कर दिए गए।
ऽडॉ. आर.यू. सिंहः ............जहां तक देशी रियासतों के शासकों की उन्मुक्ति का प्रश्न है। विधि मंत्री से हमें ऐसा कोई आश्वासन नहीं मिला है, उन मामलों में भी जो उन्होंने निजी हैसियल से किए हैं। हमारा संबंध इस प्रश्न के उसी पहलू से है। यह नहीं कहा गया है कि कुछ सूचना या कुछ ऐसी ही चीज पर्याप्त होगी, उनको दी जाने वाली उन्मुक्ति भारतीय गणराज्य के प्रमुख, यहां तक कि विभिन्न संघ राज्यों के प्रमुखों को दी गई उन्मुक्ति से कहीं ज्यादा होगी। और यदि सरकार इस संबंध में अपना विचार एवं अपनी नीति स्पष्ट करेµकि ऐसी उन्मुक्ति की अवधि क्या होगी तथा उसकी सीमा क्या होगीµमैं चुनौतीपूर्वक कह सकता हूँ कि यह बहुत विस्तृत नहीं होगीµयह वास्तव में बहुत ही अच्छी होगी।
डॉ. अम्बेडकरः भोजनावकाश से पहले मुझे कुछ उन प्रश्नों के उत्तर देने के लिए कहा गया था जो मेरे मित्र ने उठाए हैं। मैं समझता हूँ कि मैंने उनका उत्तर दे दिया था जिनका उत्तर मेरी समझ से सुरक्षित ढंग से दिया जा सकता था और मैं नहीं समझता कि जो कुछ भी मैं कह चुका हूँ उसमें और जोड़ने के लिए मेरे पास कुछ है। मैं अब सिर्फ यह कहना चाहूंगा कि यदि मेरे माननीय मित्र मुझे यह कहने की इजाजत देंगे कि ऐसा प्रतीत होता है कि उनमें कल्पना का अभाव है।
डॉ. आर.यू. सिंहः यह सभी वकीलों के पास नहीं होती।
डॉ. अम्बेडकरः वकीलों के पास कभी-कभी बहुत लम्बी कल्पना होती है। यदि उनके पास पर्याप्त कल्पना-शक्ति होती है तो उन्होंने इस बात को महसूस किया होता कि संविधान सभा ने बहुत ही निश्चित ढंग से एवं बहुत ही सही ढंग से कहा था कि निश्चित तारीख से पहले बनाई गई प्रसंविदा में जो कुछ भी शामिल किया गया था, इसमें दिए गए मामले वाद योग्य नहीं हैं। अब मैं सोचता हूँ कि यह बहुत ही अच्छी संरक्षण तथा बहुत ही अच्छा तथ्य था। इसका तात्पर्य है कि संसद या सरकार कोई भी परिवर्तन करने के लिए स्वतंत्र है, भले ही इन मामलों का उल्लेख प्रसंविदा में किया गया हो। यदि ऐसा है तो मैं समझता हूँ कि किसी भी कीमत पर सदन को इस बात से सन्तुष्ट होना चाहिए कि भविष्य किसी भी तरीके से बन्द या अंधेरे में नहीं है। मैं नहीं समझता
ऽसं. वा., खंड-8, भाग VIII, 9 फरवरी, 1950, पृष्ठ 2664-65