28. भाग-ख राज्य (विधियाँ) विधेयक - Page 253

238 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उन अधिकारियों की सूची दी गई है जिनका इस विधेयक द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अन्तर्गत भाग -ख राज्यों पर विस्तार किए जाने का प्रस्ताव है। जहां तक मैंने गिना है, ये कुल मिलाकर 135 अधिनियम हैं, जिनका भाग-ख राज्यों पर विस्तार किया जाना है।

भाग-ख राज्यों पर केन्द्रीय अधिनियमों को विस्तारित करने का प्रस्ताव रखते हुए यह महसूस किया गया है इन अधिनियमों पर काम कर रहे भारत सरकार के विभिन्न प्रशासनिक विभागों के मतानुसार स्वयं इन अधिनियमों में कुछ छोटे-छोटे संशोधन किए जाने की आवश्यकता है। परिणामस्वरूप इन 135 अधिनियमों का विस्तार करने के इस अवसर पर उपयोग इन केन्द्रीय अधिनियमों में कुछ संशोधन करने के प्रयोजन से भी किया गया है जिससे जब यह विधेयक पारित हो, तब न केवल ये अधिनियम भाग-ख राज्यों पर लागू हो जाएँ वरन् वे उस रूप में भी लागू होंगे जिस रूप में इस अनुसूची में उल्लिखित अनेक अधिनियमों में दिए गए उपबंधों द्वारा उन्हें संशोधित किया जाएगा। मैं नहीं समझता कि इस विधेयक के सिद्धान्त को लेकर किसी प्रकार के विवाद की कोई संभावना है।

अब तक केवल एक या दो चूकें सामाने आई हैं और उन्हें इस अनुसूची के अन्तर्गत लाने के लिए मैं संशोधन प्रस्तावित करता हूँ।

माननीय अध्यक्षः प्रस्ताव रखा गयाः

फ्कि भाग-ख राज्यों पर कुछ विधियों का विस्तार करने के लिए विधेयक पर विचार किया जाए।य्

ऽडॉ. अम्बेडकरः त्रावणकोर-कोचीन से आए मेरे मित्र श्री शिवन पिल्लै द्वारा उठाया गया मुद्दा बहुत ही साधारण है जैसा कि मैंने इसे समझा है। कुछ ऐसे कानून हैं जिनका इस विधेयक के माध्यम से विस्तार किए जाने का प्रस्ताव है और जो समवर्ती सूची के अन्तर्गत हैं। परिणामस्वरूप, भारत का कोई राज्य अपनी इच्छानुसार इन कानूनों में संशोधन करने के लिए स्वतंत्र होगा। उनके इस उदाहरण को लें अर्थात् भारतीय दण्ड संहिता की बात करें तो यह बिल्कुल सही है कि भारतीय दण्ड संहिता मृत्यु को एक दण्ड मानती है। यह भी समान रूप से सही है, जैसा कि उन्होंने कहा है, कि दण्ड संहिता जो त्रावणकोर पर लागू है, इस दण्ड को निर्मूल कर देती है। ठीक है, जब इस अधिनियम के अन्तर्गत भारतीय दण्ड संहिता को लागू कर दिया जाएगा तब त्रावणकोर-कोचीन विधायिका के लिए यह पूरी तरह संभव हो सकेगा कि यह संशोधन विधेयक पारित करे और भारतीय दण्ड संहिता का अपनी इच्छानुसार संशोधन कर ले। तदनुसार, जहां तक समवर्ती सूची में आने वाले कानूनों का सवाल है, भारत के वे सभी राज्य जिन्हें कानून बनाने का अधिकार है, निश्चित तौर पर अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुकूल कानून बनाएंगे।

ऽसं. वा., खंड 8, भाग II, 9 फरवरी, 1951, पृष्ठ 2669-77