28. भाग-ख राज्य (विधियाँ) विधेयक - Page 254

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जहां तक मेरे दूसरे माननीय मित्र द्वारा उठाए गए मुद्दे का सवाल है, मुझे प्रतीत होता है कि उन्होंने इस विधेयक के खंड 3 के उपबंधों को ठीक-ठीक नहीं पढ़ा है जो कहता हैःµ

फ्कि इस अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियम तथा अध्यादेश उसी रीति से एवं उसी सीमा तक संशोधित किए जाएंगे जैसा उसमें विनिर्दिष्ट किया गया है।य्

अतः यह विधेयक संशोधन के लिए विधेयक एवं उसका विस्तार करने दोनों के लिए ही है। निस्संदेह वह कह सकत हैं कि विधान का यह तरीका बहुत ही बेढंगा है, परन्तु उन्हें इसे करने की अपनी योजना पर विचार करना चाहिए। हमें यहां रुककर 135 पृथक-पृथक कानूनों को पारित करना पड़ेगा,पहले तो संशोधन करने के लिए और फिर उनका विस्तार करने के लिए। यद्यपि ऐसा करना इतना सीधा या भव्य नहीं हो सकता फिर भी मैं समझता हूं कि उस संक्षिप्त प्रक्रिया को अपनाना वांछनीय होगा जिसे इस विधेयक में अंगीकार किया गया है। अर्थात् संशोधन एवं विस्तार दोनों कें लिए, मैं नहीं समझता कि इस स्पष्टीकरण के बाद मेरे मित्र के पाए झगड़ने का कोई कारण नहीं बचेगा।

माननीय अध्यक्षः प्रश्न हैः

फ्कि भाग-ख राज्यों पर कुछ कानूनों का विस्तार करने के लिए विधेयक पर विचार किया जाए।य्

प्रस्ताव अंगीकार किया गया।

खंड 2 से 6

खंड 2 से 6 तक विधेयक में जोड़े गए।

खंड 7 (किइनाइयों को दूर करने की शक्ति)

संशोधन किया गयाः

खंड 7 के उप-खंड (2) में भाग (ख) के बाद जोड़ेंः

फ्(ग) उन क्षेत्रों या परिस्थितियों को जिनमें, या उस सीमा जिस तक, या उन स्थितियों को जिनके अधीन, उस धारा द्वारा खण्डित किसी नियम के अन्तर्गत कुछ किया गया है या कोई कार्रवाई की गई है (धारा 6 के द्वितीय परन्तु में विनिर्दिष्ट किन्हीं मामलों सहित) को विनिर्दिष्ट करें, जिन्हें इस अधिनियम या अध्यादेश जैसा अब विस्तारित किया गया है के समरूप परन्तुक के अन्तर्गत मान्यता दी जाएगी या प्रभावी बनाया जाएगा।य्

µ(डॉ. अम्बेडकर)

यथासंशोधित खंड 7 इस विधेयक में जोड़ा गया।