250 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किसी आदेश को सदन के पटल पर रखा जाएगा। ऐसा उपबन्ध अनुच्छेद 372 के संबंध में नहीं है। इसलिए मेरा निवेदन है कि इसमें वास्तव में विशेषाधिकार का मामला नहीं बनता और इस प्रकार विशेषाधिकार भंग करने का प्रश्न ही नहीं उठ सकता।
पंडित मित्रा (पश्चिम बंगाल)ः महोदय, क्या आप सामान्य चर्चा की इजाजत देने जा रहे हैं कि यह प्रश्न विशेषाधिकार का है अथवा नहीं........।
श्री भारती (मद्रास)ः अध्यक्ष ने पहले ही विनिर्णय दे दिया है कि यह विशेषाधिकार का मामला नहीं है।
माननीय उपाध्यक्षः मैं विशेषाधिकार के मामले में कोई निर्णय नहीं दे रहा हूँ। जहां तक श्री हुसैन इमाम द्वारा उठाए गए शब्द विशेषाधिकार का प्रश्न है, माननीय विधि मंत्री ने सोचा कि वे उस दूसरे मुद्दे का भी जवाब दे दें। उन्होंने अब अपना दृष्टिकोण रख दिया है। अब प्रश्न नहीं उठता है और मैं इसमें नहीं जाऊंगा।
(उपाध्यक्ष पीठासीन)
ऽमाननीय उपाध्यक्षः माननीय विधि मंत्री की बात सुनने के बाद माननीय सदस्य पुनः शुरू कर सकते हैं।
डॉ. अम्बेडकरः महोदय जिन मुद्दों को आपने मेरे सामने रखा था, मैंने उन पर विचार किया है और मैं उन मुद्दों पर अपने विचार रखना चाहूँगा।
जिस वास्तविक प्रश्न पर सदन को विचार करना है, वह यह है कि क्या यह विधेयक अनुच्छेद 117µचाहे उस अनुच्छेद का खंड (1) हो या उस अनुच्छेद का खंड (2) होµका उल्लंघन करता है। यही मुख्य मुद्दे हैं जिन पर विचार किया जाना है और अनुच्छेद 117 के आलोक के जिन खंडों पर विचार किया जाना है, वे इस विधेयक के
खंड (4), (5) तथा (6) हैं।
मैं खंड (5) तथा (6) को एक साथ लेता हूँ। अब दलील है कि ये खंड अनुच्छेद 117 के खंड (1) का उल्लंघन करते हैं। इस दलील की वैधता उस अर्थ पर निर्भर होगी जो अनुच्छेद 110 के खंड (1) के उप-खंड (घ) में संलग्न शब्द ‘विनियोजन’ को दिया जाना है जो बता है ‘वित्त विधेयक’ क्या है। अब मैं पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि ‘विनियोजन’ शब्द जो उप-खंड (घ) में प्रयुक्त हुआ हैµऔर मैंने स्वयं ‘संसदीय पद्धति’ में इसका सत्यापन किया है जहां इस मामले पर विस्तार से चर्चा की गई हैµकलात्मक शब्द है और इसमें दो बातें शामिल हैं_ पहली सेवा, विशेष सेवा का नामकरण और दूसरी उस विशेष सेवा पर खर्च किए जाने वाले धन का सही-सही आबंटन। यही दो बातें जो
ऽसं. वा., खंड 10, भाग II, 12 अप्रैल, 1951, पृष्ठ 6725-27