251
मिलकर वह बनाती हैं जिसे अब हम विनियोगन के रूप में जानते हैं और इसी अर्थ में यह शब्द संविधान के अनुच्छेद 114 तथा अनुच्छेद 266 दोनों में प्रयुक्त हुआ है।
इस विधेयक में दो खंड 5 तथा 6 को पढ़कर मैं नहीं समझता कि इन दो खंडों में कोई ऐसी चीज शामिल करना संभव है जिसे हम अब ‘विनयाजन’ शब्द से समझते हैं। मेरी राय में ये तो केवल सरकार के लिए निदेश है कि यह सेवा है जिस पर धन
खर्च किया जा सकता है जिसे सरकार खर्च कर सकती है अथवा नहीं भी कर सकती। इसलिए जहां तक इस अनुच्छेद 117, खंड (1) का सवाल है, यह कहा जा सकता है कि यह विधेयक स्पष्ट है और इस बावत कोई कठिनाई पैदा नहीं हो सकती।
अब, मैं इस विधेयक के खंड 4 पर आता हूँ। वहां हमें यह विचार करना है कि क्या यह खंड अनुच्छेद 117 के खंड (3) का उल्लंघन करता है। मेरा निष्कर्ष है कि यह करता है, क्योंकि इस विधेयक का खंड (3) सरकार पर उस सेवा का दायित्व डालता है जिस पर, यदि सदन द्वारा यह विधेयक पारित कर दिया गया, निस्संदेह संचित निधि से खर्च किया जाएगा। इसलिए इसके लिए अनुच्छेद 117 के खंड (3) के उपबंधों के अंतर्गत राष्ट्रपति की संस्तुति की आवश्यकता पड़ेगी।
विचार करने के लिए जो प्रश्न बचता है, वह यह है कि राष्ट्रपति की संस्तुति किस स्तर पर प्राप्त करनी होगी? वहां प्रयुक्त शब्द ‘विचार’ है। दलील यह है कि ‘विचार’ का अर्थ है कि इस विधेयक की पहल। मुझे भय है कि मैं इस दलील से सहमत नहीं हो सकता। किसी विधेयक के दो स्तर होते हैं पहला स्तर हमारी भाषा में ‘परिचय’ कहलाता है जो ‘विचार’ से भिन्न है। जब कोई विधेयक रख दिया जाता है, तब विचार का स्तर आरंभ होता है और विचार का स्तर उस बिन्दु से प्रारंभ होता है जब विधेयक को, परिचय के बाद, सदन द्वारा हाथ में ले लिया जाता है और जब तक यह पारित नहीं कर दिया जाता। इस अन्तराल के दौरान उस विधेयक के विचार के संबंध में कार्यवाही होती है। इसलिए मेरी विनम्र राय के अनुसार प्रस्ताव को पारित करने के लिए रखने से पूर्व यदि संस्तुति प्राप्त कर ली जाए तो इससे अनुच्छेद 117 के खंड (3) की आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाएगी। जबकि ऐसा है, तब मेरे विचार से एक व्यावहारिक मुद्दा है जिस पर विचार किया जाना चाहिए। सदन को यह सहज रूप से मानकर नहीं चलना चाहिए कि जब भी इस तरह की आवश्यकता होगी, राष्ट्रपति अपनी सहमति या संस्तुति दे देंगे। यदि वित्तीय देयता का मामला हुआ, तो राष्ट्रपति को इस मामले पर विस्तारपूर्वक विचार करना होगा और पता लगाना होगा कि क्या देश की स्थिति इस प्रकार की है कि वह और अधिक वित्तीय देयता स्वीकार करने को अपनी सहमति दे सकें। संभव है कि राष्ट्रपति अपनी संस्तुति देने से इनकार कर दें और किसी मामले में ऐसा हुआ तो सदन की मेहनत बेकार चली जाएगी। अतः मैं समझता हूँ कि इस नियम को अंगीकार करने या सुझाव देने में कोई नुकसान नहीं है कि जब कभी भी सदन के