252 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
समक्ष ऐसा विधेयक रखा जाए जिसमें संचित निधि से व्यय सम्मिलित हो या सम्मिलित होने की संभावना हो, तब सदन को इस बात पर बल देना चाहिए कि विचार करने की शुरूआत के पहले प्रभारी-सदस्य राष्ट्रपति की संस्तुति प्रस्तुत करे ताकि सदन मेहनत में जुट जाए जो अंततः बेकार न जाए।
माननीय उपाध्यक्षः हमने इस मुद्दे को पूरी तरह सुन लिया है। मैं माननीय विधि मंत्री के इस निष्कर्ष से पूरी तरह सहमत हूँ कि अनुच्छेद 110, उप-खंड (1) (घ) में प्रयुक्त ‘विनियोजन’ केवल कलात्मक पद है जो केवल उन्हीं मामलों में लागू होता है जो मामले अनुच्छेद 114 में दिए हुए हैं। फलतः ये उपबन्ध अनुच्छेद 117(1) के उपबंधों के प्रतिकूल नहीं है। निस्संदेह इसमें संचित निधि से व्यय सम्मिलित है तथा इस प्रकार अनुच्छेद 117 के उप-खंड (3) के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आता है।
ऽमाननीय अध्यक्षः जहां तक ‘मैकेनिकल’ शब्द का संबंध है, ऐसा प्रतीत होता है कि यह मशीन से संबंधित कोई खराबी हो।
जहां तक श्री सिधवा द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘कन्स्ट्रक्शन’ का सवाल है, यह बिल्कुल विपरीत प्रतीत नहीं होता। ‘स्ट्रक्चरल’ शब्द इस अर्थ की बेहतर व्याख्या करता है। साथ ही यदि इन दोनों शब्दों को निकाल दिया जाए तो शब्दावली बिल्कुल ‘डिफेक्टिव’ (दोषपूर्ण) हो जाएगी जो संभवतया अब से ज्यादा अस्पष्ट हो जाएगी। जहां तक खंड 19 में दी गई शक्तियों का सवाल है, शब्दावली ‘रजि. करण करने वाले प्राधिकरण की शक्ति, कर्तव्य तथा कार्यों एवं उनके क्षेत्राधिकार की स्थानीय सीमाओं का निर्धारण करें’ है। यदि यह नियम बनाने दिया जाए कि रजि. करण करने वाले प्राधिकरण का यह कर्तव्य होगा वह पोत (जहाज) की संरचना की भी देखभाल करे, तब मैं समझता हूँ कि यह कभी पूरी हो जाएगी। लेकिन इसका निर्णय मैं सदन के ऊपर छोड़ता हूँ। यदि माननीय मंत्री शब्दावली बदलना चाहे, तो मैं निश्चित तौर पर इस स्तर पर संशोधन की अनुमति दे दूंगा।
श्री एस.सी. सामंत (पश्चिम बंगाल)ः क्या मैं सुझाव दे सकता हूँ कि हम कहें ‘मैकेनिकली या अन्यथा डिफेक्टिव’,
श्री सन्तानमः आप इसे और अधिक अस्पष्ट बना रहे हैं।
पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय (उत्तर प्रदेश)ः यदि ‘मैकेनिकल’ शब्द हटा दिया जाए तो इन नियमों से सभी प्रकार की कमियाँ दूर हो जाएंगी।
विधि मंत्री (डॉ. अम्बेडकर)ः क्या मैं एक शब्द बोल सकता हूँ जो मुझे सूझ रहा है? मैंने इस विधेयक को नहीं देखा है, अतः मैं उस राय के आधार पर बोल रहा
ऽसं. वा., खंड 10, भाग II, 18 अप्रैल, 1951, पृष्ठ 7006-8