256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अथवा ऐसा ही कुछ लेने के लिये मामले को मूल उच्च न्यायालय में वापस भेज दें जहाँ से यह आया था। अब उत्तर प्रदेश का वकील जिसे मद्रास से आए मामले में उच्चतम न्यायालय में पैरवी करने के लिए मूलतः नियुक्त किया गया था, जबकि वह उच्चतम न्यायालय में मामले की पैरवी कर सकता है और मामले का संचालन कर सकता है और मामले पर बहस कर सकता है, जब मामला वापस मद्रास उच्च न्यायालय में भेजा जाता है वह मामले की पैरवी नहीं कर सकता, क्योंकि वह मद्रास का अधिवक्ता नहीं है, वह अधिवक्ता है उत्तर प्रदेश का। अब यह महसूस किया गया कि इस कठिनाई का समाधान किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें न केवल मुवक्किल का हित है बल्कि न्याय का हित है कि एक वकील जिसने इस मामले का अध्ययन करने के लिए और उसे समझने के लिए अपना समय और उर्जा खर्च की हो इस मामले को जब मूल न्यायालय में वापस भेजा जाए तो उसे इसकी पैरवी करने की भी स्थिति में हो।
अब इस कठिनाई का समाधान दो अलग-अलग तरीकों से किया जा सकता है। इसके समाधान का एक तरीका होगा कि कोई विशिष्ट वकील, जिसे किसी विशेष मामले की पैरवी करने के लिए नियुक्त किया गया है, जब वह मामला वापस जाता है तो वह विशिष्ट वकील उस मामले की पैरवी करने का हकदार होगा। दूसरा तरीका यह होगा कि एक आम नियम बनाया जाए कि उच्चतम न्यायालय में नामांकित सभी वकीलों और अधिवक्ताओं को यह अधिकार होगा वह किसी भी न्यायालय में विधि व्यवसाय कर सकें। मूल विचार जिस पर हम आगे बढ़ रहे थे सीमित है, किन्तु तदुपरांत और विचार किए जाने पर यह महसूस किया गया कि एक आम नियम वांछनीय होगा जो यह अनुमति देता हो कि उच्चतम न्यायालय में नामांकित सभी अधिवक्ता किसी भी उच्च न्यायालय में व्यवसाय करने के हकदार होंगे और इसमें आगे कोई कार्यविधि नहीं होगी। इस विधेयक का यही प्रस्ताव है। जैसा कि मैंने कहा इसी आम सिद्धांत को यह विधेयक मूर्त रूप प्रदान करता है। उच्चतम न्यायालय में नामांकित वकील मूल पक्ष में उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने हेतु स्वतः हकदार नहीं होगा। वह बिना किसी नामांकन के अपीली पक्ष में विधि व्यवसाय कर सकता है किन्तु मूल पक्ष में नहीं। प्रस्तावित दूसरा अपवाद ऐसे वकील से संबंधित है जो पूर्व-न्यायाधीश है और नामांकित है, क्योंकि संविधान के अस्तित्व में आने से पहले ऐसा कोई नियम नहीं था जो न्यायाधीशों को सेवानिवृत होने के बाद विधि व्यवसाय से रोकता हो। वे विधि व्यवसाय करने के लिए स्वतंत्र थे और ऐसे कई मामले हैं जिनमें न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय में नामांकित हैं और वे विधि व्यवसाय कर सकते हैं। किन्तु ऐसे भी मामले हैं जिनमें व्यक्तियों की नियुक्ति उच्च न्यायालयों में संविधान के अस्तित्व में आने से पहले हुई थी, उनसे अपेक्षित है कि वे वचन दें कि वे किसी विशेष उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय नहीं करेंगे। हमारी अपवाद कहती है कि यदि उच्चतम न्यायालय का कोई अधिवक्ता जो उच्च न्यायालय का पूर्व न्यायाधीश रहा हो तथा जिसने किसी विशेष