262 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वे सभी उच्च न्यायालयों में वकालत कर सकते हैं। निस्संदेह, इसका अर्थ है विभिन्न उच्च न्यायालयों के अधीनस्थ सभी न्यायालयों में वकालत करने का अधिकार।
दूसरा मुद्दा जो मैंने स्वीकृत किया है वह है बिल में मूलतः समाविष्ट यह प्रतिबंध कि वकालत न्यायालय में नामांकित अधिकताओं को इस बिल द्वारा दिया जा रहा वकालत का अधिकार केवल अपीली पक्ष तक ही सीमित होगा। इस खंड को हटाया जा रहा है।
मैंने विभिन्न भाषण सुने हैं और मैं इतना ही कह सकता हूँ मैं इन कठिनाइयों को महसूस करता हूं तथा विभिन्न सदस्यों द्वारा व्यक्त विचारों से मुझे सहानुभूति है। जब कभी अवसर और समय होगा, भारत सरकार निस्संदेह इस मामले पर विचार करेगी और एक ऐसा व्यापक उपाय करेगी जो भारत में बार का एकीकरण करेगा जो यहां उपस्थित अनेक सदस्यों का पसंदीदा विषय है। अतः मैं इस प्रश्न के इस पहलू पर विचार नहीं करूंगा।
तब केवल एक प्रश्न रह जाता है जिसे मेरे मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव ने उठाया था। मेरा मानना है कि यह प्रश्न भी इस विधेयक के गुणावगुणों से बाहर है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो कुछ भी हम संसद में करते हैं वह संविधान के उपबंधों के अधीन होना चाहिए। यदि संविधान का अनुच्छेद 22 यह अनुमति देता है कि कोई अभियुक्त (दोषी व्यक्ति) स्वयं के बचाव के लिए किसी विधि व्यवसायी की सेवाएं ले सकता है और यदि उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय में से किसी एक न्यायालय द्वारा लागू नामांकन नियावमली द्वारा कोई व्यक्ति संविधान के अभिप्राय के भीतर व्यवसायी नहीं बनता तो मेरे विचार में इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय द्वारा बनाए गए नियम संविधान के अनुच्छेद से अलग हों, उस समय संविधान में लिखी हुई बात ही मानी जाएगी। इस समय मैं केवल इतना ही कहना चाहूंगा कि मेरे मस्तिष्क में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है कि संविधान में फ्विधि व्यवसायीय् शब्द किस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। क्या यह इस आम लोकप्रिय अर्थ में प्रयुक्त होता है कि कोई भी व्यक्ति जो न्यायालय जा सकता है तथा किसी भी मामले (केस) में पैरवी कर सकता है, विधि व्यवसायी है अथवा क्या संविधान में इस शब्द का प्रयोग तकनीकी अर्थ में हुआ है कि विधि व्यवसायी का अर्थ है उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय द्वारा बनाई गई नियमावली अथवा विधि व्यवसायी अधिनियम में विधि व्यवसायी के रूप में परिभाषित व्यक्ति। यह एक ऐसा मामला है जिस पर मैं अपनी राय नहीं देना चाहूंगा। मेरे मित्र पंडित ठाकुर दास भी मानेंगे कि विधि व्यवसायी अधिनियम भी उन सभी को विधि व्यवसाय करने का आम अधिकार नहीं देता उन्हें विधि व्यवसायियों के रूप में परिभाषित किया गया है। कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जो कुछ वर्गों के लिए ही अलग से चिह्नित तथा सीमित है। उदाहराणार्थ, इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस अधिनियम के अर्थ में अधिवक्ता तथा मुख्तयार विधि व्यवसायी है, किन्तु जैसा कि वे जानते होंगे, विधि व्यवसाय करने का उनको कोई आम अधिकार नहीं है न ही