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ऽप्रांतेतर अधिकारिता विधेयक
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः अध्यक्ष महोदय, मैं सभा के इन सदस्यों द्वारा व्यक्त कुछ संदेहों और शंकाओं को स्पष्ट करने के लिए खड़ा हुआ हूँ जिन्होंने अभी तक वाद-विवाद में भाग लिया है।
श्रीमान् जी, संशोधन के माननीय प्रस्तावक द्वारा पेश किया गया एक मुद्दा यह था कि वह विधेयक सर्वोपरि अधिकारिता को पुनजीर्वित कर रहा है जिसे भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम द्वारा समाप्त कर दिया गया था। अब यह बिल्कुल सत्य है कि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने देशी रियासतों को सर्वोपरिता के परिणामस्वरूप उन पर अधिरोपित बाध्यताओं से निर्मुक्त कर दिया था। किंतु मेरे विचार में इसका अर्थ यह है कि डोमिनियन सरकार उत्तराधिकारी राज्य के रूप में वह अधिकारिता प्राप्त नहीं कर सकती जो सर्वोपरिता से उत्पन्न हुई थी। इसका मात्र यही अर्थ निकलता है, कुछ अधिक नहीं_ इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई भी देशी रियासत किसी करार द्वारा डोमिनियन सरकार पर ऐसे अधिकार और अधिकारिता अधिरोपित नहीं कर सकता जिनका प्रयोग ब्रिटिश सरकार द्वारा उस देशी रियासत के विरुद्ध किया जाता था। मेरे विचार में वह बात की बिल्कुल अनदेखी कर दी गई है और मैं यह बात पुनः दोहराना चाहूँगा कि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम का तात्पर्य यह है कि जहाँ तक सर्वोपरिता का संबंध है, डोमिनियन सरकार को ब्रिटिश सरकार का उत्तराधिकारी राज्य नहीं समझा जा सकता। निश्चित रूप से, इसका अर्थ यह नहीं है कि यदि कोई देशी रियासत उन कारणों से जो उसके विचार में आज्ञापक हैं, सर्वोपरिता से उत्पन्न सदृश अधिकारिता डोमिनियन सरकार पर अधिरोपित करना चाहे तो या तो भारत अधिनियम या भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम में ऐसा कुछ है जो उस देशी रियासत को ऐसा करने से निवारित करता है। मेरे विचार में इस बात को स्पष्ट रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिए। जब यह प्रश्न उठाया जाए कि वे कौन-सी देशी रियासतें हैं जहाँ यह विशिष्ट विधेयक और इसके उपबंध लागू होंगे, तो इस प्रश्न का उत्तर भारत की डोमिनियन सरकार के पक्ष में अनेक देशी रियासतों द्वारा पारित अंगीकार पत्रों से सम्बद्ध होना चाहिए। अतः यह समझने के लिए कि वे कौन-से राज्य हैं जहाँ यह विधयेक लागू होता है, हमें अंगीकार पत्रों का अध्ययन करना चाहिए और यह पता लगाना चाहिए कि इनमें क्या अंतर्विष्ट है। जैसा कि सदन को ज्ञात है, जहाँ तक देशी रियासतों के अधिमिलन का संबंध है वे तीन वर्गों में विभाजित हैंः (1) पूर्णतः अधिकारिता-प्राप्त रियासतें, (2) अर्ध अधिकारिता प्राप्त रियासतें और (3) अधिकारिताहीन राज्य। छोटे-मोटे कुछ अपवादों को छोड़कर रियासतों के तीनों वर्गों
ऽसं. स. (वि.) वा. खंड II, 2 दिसम्बर, 1947, पृष्ठ 1559-61