14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ने इंडियन डोमिनियन के पक्ष में अंगीकार पत्र पारित कर दिए हैं। अब यदि माननीय सदस्य, वर्ग (2) के अंतर्गत आने वाली रियासतों द्वारा भारत की डोमिनियन के पक्ष में पारित अंगीकार पत्र के प्रति निर्देश करें तो उन्हें यह पता चलेगा कि उनके अंगीकार पत्र में यह महत्वपूर्ण खंड अंतर्विष्ट है, जिसे मैं, सभी संदेह और शंकाओं को दूर करने के आशय से, आपकी अनुज्ञा लेकर पढ़ना चाहूंगा। यह पैरा 1 हैः
फ्और मैं यह भी घोषणा करता हूँ कि भारत डोमिनियन ऐसे अभिकरण या अभिकरणों के माध्यम से और ऐसी रीति में जैसा वह उचित समझे, राज्य में सिविल और दांडिक न्याय प्रशासन के लिए ऐसी सभी शक्तियों, प्राधिकार और अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगा जो किसी समय देशी रियासतों के संबध में सम्राट के कार्यों के निष्पादन के लिए महामहिम के प्रतिनिधि द्वारा प्रयोक्तव्य थीं।य्
मेरा निवेदन है कि वह अर्ध अधिकारिता-प्राप्त राज्यों द्वारा पारित अंगीकार पत्र में बहुत महत्वपूर्ण खंड है। अब, यदि मेरे आदरणीय मित्र रियासतों के तीसरे वर्ग का निर्देश करना चाहें और उनके द्वारा पारित अंगीकार पत्र पढ़ें तो यह निम्नानुसार हैंः-
फ्चूँकि उक्त राज्य या ताल्लुका का........... इच्छुक हूँ कि भारत डोमिनियन उक्त राज्य या ताल्लुका के संबंध में उन सभी शक्तियों और अधिकारिताओं का प्रयोग करे जो ऐसे मिलाए जाने से पूर्व देशी रियासतों के संबंध में सम्राट की ओर से महामहिम के प्रति निधि द्वारा प्रयोक्तव्य थींय् आदि।
यह एक ऐसा खंड है कि जिसे दूसरे या तीसरे वर्ग के अंतर्गत आने वाले राज्यों के अंगीकार पत्र में स्थान प्राप्त हुआ है_ इसे प्रथम वर्ग अर्थात् पूर्णतः अधिकारिता प्राप्त राज्यों के अन्तर्गत आने वाले राज्यों द्वारा पारित अंगीकार पत्र में स्थान प्राप्त नहीं हुआ है। इससे स्पष्ट रूप से दो बातों का पता चलता है। पहली यह कि यह विधेयक उन राज्यों को लागू नहीं होता है जिनके अंगीकार पत्रों में यह खंड अन्तर्विष्ट नहीं है_ दूसरी यह कि यह केवल उन राज्यों को लागू होता है जिनके अंगीकार पत्रों में ऐसा
खंड अंतर्निहित है और जिन्होंने स्वच्छा से डोमिनियन सरकार को अधिकार प्रदान किए हैं, चाहे वे किसी संधि से अथवा ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रयुक्त मौन अनुमति या प्रथा से उत्पन्न हुआ हो_ उन्होंने उन्हें स्वेच्छा से भारतीय डोमिनियम को अंतरित किया है और वे भविष्य में भी ऐसा कर सकते हैं। अब केवल बिंदु यह है कि विधेयक ने केवल इतना किया है कि जहाँ किसी राज्य ने अपने अंगीकार पत्र के द्वारा डोमिनियन को अधिकारिता प्रदान की है वहाँ केंद्रीय सरकार को उस अधिकारिता का प्रयोग करने का विधिक प्राधिकार होगा। अनाधिकार हड़पने का मामला बिल्कुल नहीं है_ यह मात्र ऐसे अधिकारों और अधिकारिता को विधिक प्राधिकार देना है जिन्हें देशी रियासतों द्वारा भारत की डोमिनियन को स्वेच्छा से अंतरित किया गया है। अतः, पहली बात, जिस पर