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ऽसिविल प्रक्रिया संहिता (संशोधन) विधेयक
विधि मंत्री (डॉ. अम्बेडकर)ः मैं सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का और आगे संशोधन करने के लिए विधेयक पुरःस्थापित करने की अनुमति चाहूंगा।
माननीय अध्यक्षः प्रश्न हैः
फ्कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का और आगे संशोधन करने के लिए विधेयक पुरःस्थापित करने की अनुमति दी जाए।य्
प्रस्ताव अंगीकार किया गया।
डॉ. अम्बेडकरः मैं विधेयक पुरःस्थापित करता हूँ।
ऽऽसिविल एवम् दंड प्रक्रिया संहिताएं (संशोधन) विधेयक
ऽऽऽविधि मंत्री (डॉ. अम्बेडकर)ः मैं प्रस्ताव पेश करने की अनुमति चाहता हूँः
फ्कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 का और आगे संशोधन करने के लिए विधेयक पर विचार किया जाए।य्
इस विधेयक का उद्देश्य अधीनस्थ न्यायालय के कार्यक्षेत्र में परिवर्तन लाना है। जैसा कि सदन जानता है संविधान ने भारत के न्यायालयों को यह घोषणा करने का अधिकार दिया है कि विधानमंडल, केन्द्र अथवा प्रांत द्वारा बनाए गए कोई विशेष कानून उस विधानमंडल के अधिकाराधीन या अधिकारसतीत है। अब इस अधिकार का उपयोग अधीनस्थ न्यायाधीशों द्वारा किया जा रहा है और संसद सदस्यों को जानकारी होनी चाहिए कि विभिन्न अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा कुछ असाधारण निर्णय दिए गए हैं जिनमें कुछ कानूनों को अधिकारातीत घोषित किया गया है। यह महसूस किया गया है कि अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए यह घोषित करने का अधिकार छोड़ना उचित नहीं होगा कि राज्य द्वारा बनाए गए कानून अधिकाराधीन अथवा अधिकारातीत हैं।
सबसे पहले, अधीनस्थ न्यायपालिका के सदस्यों की अवमानना किए बिना कानून की अधिकाराधीन अथवा अधिकारातीत होने से संबंधित समस्याओं से निपटाने के लिए अधीनस्थ न्यायपालिका को योग्य नहीं कहा जा सकता। दूसरा, सामान्यतः अधीनस्थ
ऽसं. वा., खंड 7, भाग II, 18 दिसंबर, 1950, पृष्ठ 1834-35
ऽऽसं. वा., खंड 10, भाग II, 20 अप्रैल, 1951, पृष्ठ 7153-76
ऽऽऽसं. वा., खंड 10, भाग II, 20 अप्रैल, 1951, पृष्ठ 7153-54