268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
न्यायालयों के सामने प्रस्तुत होने वाले वकील ऐसे बिन्दुओं के सही निर्णय करने के लिए न्यायालयों की सहायता करने में सक्षम नहीं हो सकते। अतः महसूस किया गया है कि सांविधानिक महत्व के प्रश्नों के निर्णय की एकरूपता के पक्ष में यह उचित है कि किसी भी कानून को अधिकारातीत घोषित करने के अधिकार को अधीनस्थ न्यायपालिका से वापस ले लेना चाहिए। यह विधेयक अमरीका के कुछ राज्यों में मौजूद प्रक्रिय का अनुकरण करता है जिनमें कानून द्वारा अधीनस्थ न्यायपालिका को सांविधानिक महत्व के प्रश्नों पर निर्णय देने से मना किया गया है।
इसके अतिरिक्त इस विधेयक में कोई विशेष बात नहीं है। हमारा एक ऐसे परंतुक को जोड़ कर सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 113 में इस विधेयक द्वारा संशोधन करने का प्रस्ताव है जिसके द्वारा अधीनस्थ न्यायाधीश यह आवश्यक समझता है कि कोई विशेष कानून अधिकारातीत है तो उक्त मामला उच्च न्यायालय में भेजा जाए तथा उसके निर्णय का इंतजार किया जाए। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 को भी संशोधित करने का प्रस्ताव है। यदि मजिस्ट्रेट समझता है कि यह अधिनियम अधिकारातीत है तो मामले को उच्च न्यायालय में भेजा जाए।
यह सब इस विधेयक में है जिसकी मैंने सदन से सिफारिश की है।
माननीय अध्यक्षः प्रस्ताव रखा गयाः
फ्कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 तथा दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 का और आगे संशोधन करने के लिए विधेयक पर विचार किया जाए।य्
ऽडॉ. टेक चन्दः .........मेरा निवेदन है कि यह विधेयक काफी ठोस सिद्धांतों पर आधारित है और इसे बिना चर्चा के पारित किया जाना चाहिए।
मुझे अपने माननीय मित्र श्री शिव चरण लाल द्वारा की गई टिप्पणियों के संबंध में कुछ कहना है। वे समझते हैं कि अधिनियम, अध्यादेश एवम् विनियम शब्दों के बाद फ्नियमों अथवा आदेशोंय् शब्दों को जोड़ा जाए जो इस विधेयक में पहले से ही हैं अर्थात अधिनियम, अध्यादेश अथवा विनियम के अधीन पारित विशेष नियम अथवा विशेष आदेश की वैधता से संबंधित प्रश्न उठता है तो उसे भी उसी तरह उच्च न्यायालय में भेजा जाना चाहिए जैसा कि इस विधेयक में उसी अधिनियम, अध्यादेश अथवा विनियम की वैधता से संबंधित बिन्दुओं के लिए उपबंध है।
इस संबंध में मैं कहना चाहूंगा कि न तो यह आवश्यक है और न अनुकूल है कि कलक्टर अथवा किसी अन्य अधिकारी द्वारा जिसे नियम बनाने अथवा आदेश
ऽसं. वा., खंड 10, भाग II, 20 अप्रैल, 1951, पृष्ठ 7172-76